Sikkim Foundation Day: हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच बसा सिक्किम आज भले ही भारत का एक शांत और खूबसूरत राज्य माना जाता हो, लेकिन इसकी कहानी उतनी ही रोचक और ऐतिहासिक मोड़ों से भरी हुई है. 16 मई 1975 का दिन इस छोटे से पहाड़ी राज्य के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया, जब सिक्किम ने राजशाही को अलविदा कहकर भारत के 22वें राज्य के रूप में अपनी नई पहचान बनाई.
जब सिक्किम में शुरू हुई थी राजशाही
सिक्किम का इतिहास काफी पुराना माना जाता है. कहा जाता है कि 8वीं शताब्दी में बौद्ध गुरु पद्मसंभव का यहां आगमन हुआ था, जिससे इस क्षेत्र में बौद्ध संस्कृति की नींव मजबूत हुई. लेकिन असली राजनीतिक ढांचा 1642 में बना, जब युक्सोम में तीन बौद्ध लामाओं ने फुन्त्सोंग नामग्याल को सिक्किम का पहला चोग्याल यानी राजा घोषित किया. यहीं से नामग्याल वंश की राजशाही की शुरुआत हुई, जो करीब तीन शताब्दियों से भी ज्यादा समय तक चली.
समय के साथ राजधानी बदली, रबदेन्त्से का निर्माण हुआ और सिक्किम को नेपाल, भूटान और तिब्बत जैसे पड़ोसी क्षेत्रों से कई बार संघर्षों का सामना करना पड़ा. लगातार हमलों और राजनीतिक दबावों ने इस छोटे से राज्य की स्थिति को काफी जटिल बना दिया.
19वीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद सिक्किम की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला. कई संधियों के जरिए कुछ इलाके ब्रिटिश नियंत्रण में चले गए, जिनमें डार्जिलिंग जैसे क्षेत्र भी शामिल थे. धीरे-धीरे चोग्याल की स्थिति सीमित होती गई और ब्रिटिश प्रभाव बढ़ता गया.
भारत की आज़ादी के बाद सिक्किम ने खुद को पूरी तरह भारत में मिलाने के बजाय एक संरक्षित राज्य का दर्जा चुना. यानी प्रशासनिक तौर पर वह भारत के साथ तो था, लेकिन पूरी तरह उसका हिस्सा नहीं बना था.
1970 का दशक और बड़ा बदलाव
1970 के दशक तक सिक्किम में राजनीतिक असंतोष बढ़ने लगा था. जनता के बीच लोकतंत्र की मांग तेज हो रही थी और राजशाही का प्रभाव कमजोर पड़ता जा रहा था. 1973 के आसपास हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि भारत सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा.
इसके बाद 1975 में एक जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें भारी बहुमत ने भारत में विलय के पक्ष में वोट दिया. इसी के बाद 16 मई 1975 को सिक्किम आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया और एक नया संवैधानिक राज्य बन गया.
इतिहास को समझने वाली किताबें
सिक्किम के इस बदलाव को समझने के लिए कई लेखकों ने महत्वपूर्ण किताबें लिखी हैं. इनमें सुनीन्दा के. दत्ता-रे, जी.बी.एस. सिद्धू और बी.एस. दास जैसे लेखकों की रचनाएं खास तौर पर उल्लेखनीय हैं, जो इस ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से सामने लाती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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