Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

तुर्कमान गेट: आपातकाल की एक काली स्याही से लिखी गई त्रासदी

दिल्ली के तुर्कमान गेट पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने आपातकाल के दौर की उस भयावह घटना की याद ताज़ा कर दी, जब 18 अप्रैल 1976 को तोड़फोड़ और पुलिस फायरिंग में दर्जनों लोगों की जान गई थी.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तुर्कमान गेट स्थित फ़ैज़-ए-इलाही मस्जिद के पास बने अतिक्रमण को बीती रात ध्वस्त कर दिया गया. अतिक्रमण हटाने की ये कार्रवाई दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के बाद की गई है. इस दौरान स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई.

इसने 18 अप्रैल 1976 के दिन दिल्ली के इस पुराने शहर में एक भयावह अध्याय के रूप में दर्ज घटना को फिर से चर्चा में ला दिया. तुर्कमान गेट, दिल्ली की दीवारों से घिरे इलाके का एक प्रमुख प्रवेश द्वार, जहां ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग, अपनी छोटी-छोटी झुग्गियों और मकानों में रहते थे. इसी जगह पर आपातकाल के दौरान हुए अंधाधुंध तोड़फोड़ और पुलिस फायरिंग ने कई लोगों की जान ली और हजारों को बेघर कर दिया. यह घटना आज भी भारतीय लोकतंत्र के काले पन्नों में से एक मानी जाती है.

पृष्ठभूमि: आपातकाल और सुधार का नाम

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा के बाद संविधान निलंबित हो गया, प्रेस पर सेंसरशिप लग गई, विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए. इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी को दिल्ली में “शहरी सुधार” और “परिवार नियोजन” अभियान का अनौपचारिक लेकिन असीमित अधिकार मिल गया. इन अभियानों के नाम पर जबरन नसबंदी (विशेषकर पुरुषों की) और झुग्गी-झोपड़ी उजाड़ने का अभियान तेजी से चला. दिल्ली के पुराने शहर को “साफ-सुथरा” और “सुंदर” बनाने का लक्ष्य रखा गया, जिसमें जमाना मस्जिद को तुर्कमान गेट से स्पष्ट दिखाई देने की बात भी कही गई.

18 अप्रैल 1976: क्या हुआ उस दिन?

सुबह के समय दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और नगर निगम की टीमें भारी पुलिस बल के साथ तुर्कमान गेट क्षेत्र में पहुंचीं. दर्जनों बुलडोजरों ने इलाके की झुग्गियों, दुकानों और मकानों को तोड़ना शुरू कर दिया. स्थानीय निवासियों ने विरोध किया क्योंकि उन्हें पहले से कोई सूचना नहीं दी गई थी, न ही कोई वैकल्पिक आवास या पुनर्वास की गारंटी.

जैसे-जैसे तोड़फोड़ बढ़ी, लोग सड़कों पर इकट्ठा होने लगे. महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे. विरोध शांतिपूर्ण था, लेकिन पुलिस ने स्थिति को हिंसक बना दिया. रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने हवाई फायरिंग की, फिर लाठीचार्ज किया और अंत में असली गोलियां चलाईं.

कई प्रत्यक्षदर्शियों और बाद की जाँचों में दर्ज हुआ कि गोलीबारी में दर्जनों लोग मारे गए. आधिकारिक आंकड़े बहुत कम बताए गए (कुछ में 6-8 मौतें), लेकिन स्वतंत्र रिपोर्ट्स, पत्रकारों और मानवाधिकार संगठनों ने 100 से अधिक मौतों का अनुमान लगाया. सैकड़ों घायल हुए और हजारों लोग बेघर हो गए. कई शवों को कथित तौर पर गुप्त रूप से हटा दिया गया ताकि आंकड़े छिपाए जा सकें.

संजय गांधी की भूमिका

यह अभियान संजय गांधी के प्रत्यक्ष निर्देश पर चल रहा था. कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि वे खुद मौके पर पहुंचे या उनके करीबी अधिकारी जैसे जगमोहन (तब DDA उपाध्यक्ष) ने इसकी कमान संभाली.

ये भी पढ़ें- ‘मेरे हाथ में चुनाव आयोग होगा, तो बीजेपी के 4 टुकड़े कर दूंगा…’, उद्धव गुट वाली शिवसेना के नेता संजय राउत का बयान

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital