Iran US Conflict: ईरान और अमेरिका (Iran US Conflict) के बीच संघर्ष का आज 11वां दिन है. इस संघर्ष में दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ है. इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने आरोप लगाया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान से युद्ध के लिए उकसाया गया है. उन्होंने ये आरोप अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम, इजरायल के राष्ट्रपति नेतन्याहू पर लगाया है. इसके अलावा इस जंग के लिए उन्होंने मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर्स को भी जिम्मेदार ठहराया है. तो सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिक में मिलिट्री कंपनियां इतनी ताकतवर हैं कि वो दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स तक को झुका सकती हैं. इस सवाल का जवाब जानने से पहले आइये इतिहास में झांकते हैं.
साल था 1961, अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर अपना विदाई भाषण दे रहे थे. उन्होंने अपने भाषण में अमेरिका के अगले राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी को एक चेतावनी दी. जिसमें उन्होंने कहा,
शांति बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण तत्व हमारी सैन्य व्यवस्था है. हमारे हथियार शक्तिशाली और तुरंत कार्रवाई के लिए तैयार होने चाहिये, लेकिन…सरकार के परिषदों में हमें मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स के अनुचित प्रभाव हासिल करने से बचना होगा…गलत जगह पर शक्ति के विनाशकारी उदय की संभावना मौजूद है और बनी रहेगी.
इस भाषण में आइजनहावर ने चेतावनी दी थी कि सैन्य बलों, रक्षा कंपनियों और राजनीतिज्ञों के बीच गठजोड़ मजबूत हो सकता है. जो देश की नीतियों पर अनुचित प्रभाव डाल सकता है.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर का यह अंदेशा अब सच होता दिख रहा है. जो ट्रंप यह कहते फिरते थे कि वो दुनिया में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को घर वापस लाएंगे. उसी ट्रंप के राज में इस समय अमेरिका कम से कम 10 जगहों पर संघर्ष में फंसा हुआ है. जहां हजारों की संख्या में अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं.
अमेरिक में रक्षा कंपनियां क्यों लगाती हैं पैसा
अमेरिका के सीनेटर बर्नी सैंडर्स (Bernie Sanders) ने 2024 के एक लेख में रक्षा कंपनियों पर आरोप लगाया कि वे कानूनी रिश्वत (legalized bribery) के जरिये राजनेताओं को प्रभावित कर रही हैं. उन्होंने अपने लेख में बताया कि यह कंपनियां मुनाफे वाली कॉनट्रैक्ट्स से कुछ हिस्सा उन नेताओं तक पहुंचाती हैं, जो रक्षा बजट को बढ़ाने के लिए दबाव या कैंपेन चलाते हैं. इन नेताओं को पैसे देकर ये रक्षा कंपनियां वार प्रॉफिट कमाती हैं.
बर्नी सैंडर्स का कहना है कि युद्ध से हथियार कंपनियां अरबों डॉलर का मुनाफा कमाती हैं. इसलिए वो जियोपॉलिटिक्स में अमेरिकी सैन्य दखल को बढ़ावा देने के लिए दबाव ग्रुप का सहारा लेती हैं.
अमेरिकी रक्षा कंपनियों की भूमिका
हथियार बनाने वाली कंपनिया (जैसे – Lockheed Martin, RTX/Raytheon, Boeing, General Dynamics, Northrop Grumman) मुख्य रूप से दो तरीके से अमेरिकी राजनीति में पैसा लगाती हैं.
Built to perform when stakes are highest — we rise together to secure the skies.
Learn about our capabilities. 🔗⬇️
— Lockheed Martin (@LockheedMartin) February 26, 2026
लॉबिंग (Lobbying)
ये कंपनियां वाशिंगटन में हजारों लॉबिस्ट को अपने लिए खड़ी करके रखती हैं, जिसमें पत्रकार और राजनेता जैसे लोग होते हैं. साल 2025 में डिफेंस सेक्टर ने लगभग 190 मिलियन डॉलर (करीब 1600 करोड़ रुपये) से ज्यादा पैसा सिर्फ लॉबिंग पर खर्च किया है. ये लॉबिस्ट कांग्रेस, पेंटागन और व्हाइट हाउस पर दबाव डालते हैं ताकि डिफेंस बजट बढ़े और नए हथियार प्रोग्रामों को लेकर सरकार की तरफ से टेंडर जारी हों. जिससे सरकार को हथियार बेचकर मुनाफा कमाया जा सके.
चुनावी चंदे में पैसा लगाना
अमेरिकी हथियार कंपनियां दोनों पार्टियों (डेमोक्रेट और रिपब्लिकन) को चुनाव में पैसा डोनेट करती हैं. ताकि चाहे सरकार किसी की भी हो उनके मुनाफे में कभी कटौती ना हो.
साल 2023-2024 के चुनावी कैंपेन में टॉप डिफेंस कंपनियों ने दोनों पार्टियों यहां तक कि किसी खास प्रत्याशियों को भी भारी चंदा डोनेट किया.
इस चुनाव में जहां Lockheed Martin ने लगभग 4.67 मिलियन डॉलर का डोनेशन दिया. तो वहीं Northrop Grumman और RTX ने क्रमश: 3.42 मिलियन डॉलर और 2.90 मिलियन डॉलर दिये.
ये पैसे दोनों पार्टियों को दिये जाते हैं. कई कांग्रेस सदस्यों के पास इन कंपनियों के स्टॉक भी होते हैं. कई पूर्व पेंटागन अधिकारी रिटायर होने के बाद इन कंपनियों में जॉब कर लॉबिंग करते हैं.

क्या इससे ही दुनिया में चलता रहता है युद्ध?
हर जंग में अमेरिका की मौजूदगी इन कंपनियों के कामकाज को संदिग्ध बनाता है, लेकिन इन कंपनियों के चलते ही दुनिया में युद्ध चलता है ये बात थोड़ी जटिल हो जाती है.
साल 2020-2024 के बीच पेंटागन ने कई निजी हथियार कंपनियों को 2.4 ट्रिलियन डॉलर (करीब 200 लाख करोड़) के कॉन्ट्रैक्ट दिये थे. जिसमें से आधे कॉन्ट्रैक्ट तो सिर्फ 5 बड़ी कंपनियों को मिले. यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष के बाद इन कंपनियों के प्रॉफिट में बड़ा उछाल देखा गया. साल 2023 में इन कंपनियों की विदेशी हथियार बिक्री रिकॉर्ड 238 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी. ये आंकड़े बताते हैं कि चाहे युद्ध कहीं भी हो फायदा अमेरिकी कंपनियों को ही होता है.
हर थिंक टैंक भरोसे के काबिल नहीं
इसके अलावा अमेरिका में कई विश्लेषक इन कंपनियों के लिए लॉबिंग का काम करते हैं. वे न्यूज या टेलिविजन पर आकर लगातार युद्ध के बारे में बात करते हैं. वे ऐसे थिंक टैंक को फंड करते हैं, जो किसी भी खतरे को बढ़ा चढ़ाकर दिखाते हैं. जिससे अमेरिकी सरकार लगातार रक्षा बजट को बढ़ाए रखती है और इनका मुनाफा बनता रहता है. लेकिन सीधे युद्ध शुरू कर देना इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है. ज्यादातर मामले जियोपॉलिटिकल कारणों से पैदा होते हैं. जिनका ये कंपनियां फायदा उठाती हैं और लॉबिंग के माध्यम से युद्ध को लंबा खींचने या हथियार सप्लाई को बढ़ाने में मदद करती हैं.
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युद्ध के पीछे सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि पैसे और ताकत का बड़ा खेल छुपा होता है. अमेरिका की रक्षा कंपनियों की बढ़ती धमक आइजनहावर की चेतावनी पर सटीक बैठ रही है. हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि युद्ध इन्हीं कंपनियों की वजह से होता है, लेकिन इतना जरूर है कि हर युद्ध में इन्हीं कंपनियों को सबसे ज्यादा मुनाफा होता है.
-भारत एक्सप्रेस
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