सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मेजर मनीष भटनागर की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. मनीष भटनागर द्वारा दायर जनहित याचिका में 1999 के कारगिल युद्ध से पहले और कारगिल युद्ध के दौरान की घटनाओं की तथ्यात्मक समीक्षा करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. भटनागर ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की कि वह जमीन पर मौजूद प्रत्यक्ष चश्मदीदों, जैसे कि उनके और अन्य लोगों की प्रासंगिक गवाही की जांच करें, जो अभी भी मिल सकते है.
भटनागर ने केंद्र सरकार को कारगिल युद्ध 1999 का सही और सटीक रिकॉर्ड और इतिहास बनाने का निर्देश देने की मांग की थी. क्योंकि यह सीखे गए सबक का हिस्सा है और राष्ट्रीय रक्षा रणनीति की आधारशिला बन जाता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालने वाले जोखिमों, खतरों और संभावनाओं से मुक्ति के मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता को प्रभावित करता है.
कारगिल युद्ध 1999 की समीक्षा की मांग
उन्होंने अपनी जनहित याचिका में आरोप लगाया है कि ऐसी गवाही को शामिल न करने से गलत निष्कर्ष निकल रहा है. जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता को खतरा है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है. मनीष भटनागर को कारगिल युद्ध के बाद कोर्ट मार्शल किया गया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि ब्रिगेडियर रैंक से ऊपर के किसी भी अधिकारी को कथित विफलताओं के लिए दोषी नही ठहराया जा सकता है.
भटनागर की माने तो मई 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठ का पता चलने से काफी पहले ही इसकी सूचना दे दी थी, लेकिन सेना के शीर्ष अधिकारियों ने उनकी चेतावनी को अनदेखी की थी. भटनागर को 2001 में कोर्ट मार्शल किया गया और सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. उन्हें अच्छे आदेश और सैन्य अनुशासन के प्रतिकूल कार्य का दोषी पाया गया था और उन्हें अपराध के अनुपात से कहीं ज्यादा सजा दी गई थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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