उत्तर प्रदेश के गैरकानूनी धर्म परिवर्तन कानून 2024 की वैधता की चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार हो गया है. सीजेआई संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने वरिष्ठ वकील एस मुरलीधर की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पर सहमत हो गया है. मुरलीधर ने कहा कि उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम 2024 के कुछ प्रावधान अस्पष्ट और बहुत व्यापक हैं.
कोर्ट 13 मई को करेगा अगली सुनवाई
उन्होंने कहा कि अस्पष्टता भाषण और धार्मिक प्रचार की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है. कोर्ट 13 मई को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. यह याचिका लखनऊ की रहने वालीरूप रेखा वर्मा सहित अन्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि धर्म परिवर्तन कानून संविधान 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 19 (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 ( जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है.
याचिका में कही गई ये बात
याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिनियम की धारा 2 और 3 अस्पष्ट बहुत व्यापक और स्पष्ट मानकों की कमी है. जिससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि अपराध क्या है. याचिका में कहा गया है कि यह अस्पष्टता वाक स्वतंत्रता और धार्मिक प्रचार का हनन करती है, जिससे मनमाने और भेदभावपूर्ण तरीके से इसेलागू किया जाना संभव हो जाता है. जबकि दंडनीय कानून सटीक होने चाहिए.
धर्मांतरण विरोधी कई याचिका सुप्रीम कोर्ट में है लंबित
अस्पष्ट प्रावधान अधिकारियों को अत्यधिक विवेकाधिकार प्रदान कर और निर्दोष व्यक्तियों के खिलाफ गलत तरीके से मुकदमा चलाने का जोखिम मोल लेकर संवैधानिक सिद्धांतो का उल्लंघन है. याचिका में कहा गया है कि मुख्य चिंता यह है कि 2024 का संशोधन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को शामिल किए बिना शिकायत दर्ज करने के लिए अधिकृत व्यक्तियों की श्रेणी का विस्तार करता है. बता दें कि धर्मांतरण विरोधी कई याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
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