दिल्ली हाईकोर्ट (प्रतीकात्मक फोटो)
दिल्ली हाईकोर्ट में विधि शोधकर्ताओं के मासिक पारिश्रमिक को 65 हजार रुपए से बढ़ाकर 80 हजार रुपए करने तथा बकाया राशि देने की मांग को लेकर याचिका दायर की गई है. लेकिन जस्टिस सी. हरिशंकर एवं जस्टिस अजय दिगपॉल की पीठ ने निजी कारणों से याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. अब मामले को दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया. मुख्य न्यायाधीश तय करेंगे कि दाखिल याचिका पर कौन सी बेंच सुनवाई करेगी.
यह याचिका 13 शोधकर्ताओं ने दाखिल की है, जो वर्ष 2018 से वर्ष 2025 के बीच दिल्ली हाईकोर्ट में बतौर विधि शोधकर्ता के रूप में संविदा के आधार पर कार्यरत थे या हैं. याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ओर से जारी निर्देशों को लागू करने की मांग की है, जिसमें विधि शोधकर्ताओं का मासिक पारिश्रमिक 1 अक्टूबर, 2022 से बढ़ाकर 80 हजार रुपए करने तथा बकाया राशि पर 18 फीसदी की दर से प्रति वर्ष की दर से ब्याज देने की बात कही गई थी.
दो साल से लंबित है दिल्ली सरकार की मंजूरी
याचिका में कहा गया है कि 16 अगस्त, 2023 को मुख्य न्यायाधीश ने 1 अक्टूबर, 2022 से पारिश्रमिक बढ़ाकर 80 हजार रुपए करने को मंजूरी दी थी. लेकिन इस आदेश को अभी तक लागू नहीं किया गया है.
उसमें कहा गया है कि दिल्ली सरकार को उक्त प्रस्ताव भेजे दो साल हो गए हैं, लेकिन उसे अभी तक लागू नहीं किया गया है. यहां तक कि 7 मई, 2024 को स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद भी आदेश को लागू नहीं किया गया है. इस तरह से मुख्य न्यायाधीश के 16 अगस्त, 2023 के आदेश का पालन नहीं किए जाने की वजह से याचिका दाखिल करने को मजबूर होना पड़ा है.
याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि उपराज्यपाल की मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश को मंजूरी न देने या खारिज करने और सिफारिश को दबाए रखने की कार्रवाई गलत है. इस तरह की कार्रवाई याचिकाकर्ताओं और अन्य लोगों को न्यायाधीशों के साथ जुड़ाव के दौरान कानून शोधकर्ताओं की कड़ी मेहनत और लंबे समय के लिए उच्च मासिक पारिश्रमिक प्राप्त करने के लाभ या लाभ से वंचित करती है.
ये भी पढ़ें: NDA चयनित अभ्यर्थी की याचिका पर हाई कोर्ट सख्त, AIIMS को मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



