Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ 22 जुलाई को करेगी सुनवाई

Droupadi Murmu: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विधेयकों पर फैसले में राज्यपालों और राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक सवाल पूछे हैं. इसपर 22 जुलाई को संविधान पीठ सुनवाई करेगी.

स्वच्छता की मिसाल बने शहर आज होंगे सम्मानित, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू प्रदान करेंगी स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार- भारत एक्सप्रेस

President Droupadi Murmu: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर फैसला लेने के लिए तय समय सीमा को लेकर पूछे गए सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ 22 जुलाई को सुनवाई करेगी. संविधान पीठ में सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर शामिल है. राष्ट्रपति ने आपत्ति जताते हुए 14 सवाल पूछे है. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला 8 अप्रैल को सुनाया था.

राष्ट्रपति ने फैसलों के संवैधानिक मूल्यों और व्यवस्थाओं के विपरीत बताया और इसे संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करार दिया है. संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 संवैधानिक सवालों पर राय मांगी है.

अनुच्छेद 200 और 201 पर राष्ट्रपति की आपत्तियां

राष्ट्रपति ने पूछा है कि जब राज्यपाल को भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है कि उनके सामने संवैधानिक विकल्प क्या है? क्या राज्यपाल भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत किसी विधेयक को प्रस्तुत किए जाने पर अपने पास उपलब्ध सभी विकल्पों के प्रयोग करते समय मंत्री परिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह से बाध्य है?

राष्ट्रपति ने कहा कि संविधान में राष्ट्रपति या राज्यपाल के विवेकाधीन निर्णय के लिए किसी समय-सीमा का उल्लेख नहीं है. यह निर्णय संविधान के संघीये ढांचे, कानूनों की एकरूपता, राष्ट्र की सुरक्षा और शक्तियों के पृथक्करण जैसे बहुआयामी विचारों पर आधारित है. क्या भारत के संविधान का अनुच्छेद 361 भारत के संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कार्यों के न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है? क्या भारत के संविधान के अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक विवेक का प्रयोग न्यायोचित है?

उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक विवेक का प्रयोग अनिवार्य रूप से बहुकेंद्रीय विचारों द्वारा नियंत्रित होता है, जिसमें संघवाद, कानूनों की एकरूपता, राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत शामिल है. क्या संविधान की शक्तियों के इस्तेमाल और राष्ट्रपति/राज्यपाल के आदेशों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत किसी भी तरह से प्रतिस्थापित किया जा सकता है?

विधेयकों पर फैसले की समय सीमा पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन

अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्यपाल को विधानसभा द्वारा पारित विधेयक प्रस्तुत किए जाने पर धन विधेयकों को छोड़कर, विधेयक को स्वीकृति प्रदान करनी होगी या जितनी जल्दी हो सके सदन द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस भेजना होगा. प्रावधान यह भी निर्धारित करता है कि जब विधेयक पुनर्विचार के बाद राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो राज्यपाल स्वीकृति नहीं रोकेंगे.राष्ट्रपति ने यह भी पूछा है कि जब देश का संविधान राष्ट्रपति को किसी विधेयक पर फैसले लेने का विवेकाधिकार देता है तो फिर सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप कैसे कर सकता है.

बता दें कि जस्टिस जे. बी. पारदीवाला ने यह अहम फैसला सुनाया था. जिस फैसले के बाद राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्यपाल को किसी विधेयक पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा. इस समय सीमा में या तो स्वीकृति दें या पुनर्विचार हेतु लौटादें. यदि विधानसभा पुनः पारित करती है कि राज्यपाल को एक महीने के भीतर उसकी स्वीकृति देनी होगी. यदि विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा गया हो तो राष्ट्रपति को भी तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा.

ये भी पढ़ें: चोट के निशान न होने पर भी नाबालिग का बयान खारिज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

-भारत एक्सप्रेस 



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital