सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मुसलमानों में प्रचलित तलाक-ए-हसन, तलाक-ए-अहसन, तलाक-ए-किनाया, पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग एनसीपीसीआर से राय मांगी है.
कोर्ट ने प्रभावित महिलाओं और विवाहेत्तर संबंधों से पैदा हुए बच्चों पर तलाक -ए-हसन के प्रभाव की जांच करने के लिए राय मांगी है. कोर्ट नवंबर को तीसरे हफ्ते में इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. यह याचिका तलाक पीड़िता बेनजीर हिना सहित आठ लोगों की ओर से दायर की गई है.
दायर याचिकाओं में कहा गया है कि तलाक-ए-हसन जैसी व्यवस्था पुरुषों को अपनी मर्जी से शादी खत्म करने का एकतरफा अधिकार देती है. यह मुस्लिम महिलाओं को असमानता की स्थिति में रखता है. इससे पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर पति और पत्नी एक साथ नहीं रह सकते तो रिश्ता तोड़ने के इरादे में बदलाव न होने के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तलाक दिया जा सकता है.
तलाक-ए-हसन इस्लाम में तलाक देने का एक तरीका है, जिसमें पति अपनी पत्नी को तीन महीने में तीन बार तलाक बोलकर तलाक देता है. इससे महिलाओं और उनके बच्चों की जिंदगी पर गहरा असर पड़ रहा है.
कोर्ट ने इन प्रथाओं के एक सामाजिक और कानूनी प्रभावों की जांच के लिए महिला आयोग सहित अन्य को नोटिस जारी कर राय मांगा है. याचिका में यह भी दावा किया गया है कि कई इस्लामी राष्ट्रों ने इस तरह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है, जबकि यह सामान्य रूप से भारतीय समाज और विशेष रूप से याचिकाकर्ता की तरह मुस्लिम महिलाओं को परेशान करना जारी रखे हुए हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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