E-20 पेट्रोल नीति के खिलाफ दायर जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. जनहित याचिका में मांग की गई थी कि वाहन के प्रदर्शन पर इथेनॉल के प्रभावों पर चिंताओं को उजागर किया जाए.
यह जनहित याचिका अधिवक्ता अक्षय मल्होत्रा ने दायर की थी. सीजेआई बी आर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी अंजारिया की पीठ ने खारिज किया है.
स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को मिलेगा बढ़ावा
E-20 नीति का उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, कार्बन उत्सर्जन कम करना और स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों को बढ़ावा देना है.
याचिकाकर्ता के अनुसार एथोनॉल-मुक्त विकल्प प्रदान किए बिना केवल E 20 पेट्रोल की पेशकश करना उन लाखों वाहन मालिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिनके वाहन उच्च एथोनॉल मिश्रण पर चलने के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं.
एथोनॉल की मात्रा के बारे में जन जागरूकता की कमी
उन्होंने यह भी कहा कि ईंधन में एथोनॉल की मात्रा के बारे में जन जागरूकता की कमी उपभोक्ताओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत गारंटीकृत एक सूचित निर्णय लेने के अधिकार से वंचित करती है.
याचिका में कहा गया है कि भारतीय उपभोक्ताओं का एक बड़ा हिस्सा इस बात से अनजान है कि उनके वाहनों में इस्तेमाल होने वाला ईंधन शुद्ध पेट्रोल नहीं, बल्कि पेट्रोल और एथोनॉल का मिश्रण है.
E 20 का उपयोग करते समय इंजन की क्षति
इस महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा न करना, सूचित उपभोक्ता विकल्प को कमजोर करता है. इस तरह की लापरवाही के कारण, कई वाहन मालिक अपने वाहनों के साथ यांत्रिक समस्याओं के बारे में शिकायत करते हैं, जो अप्रैल 2023 से पहले बनाए गए हैं और उच्च एथोनॉल सामग्री के लिए डिजाइन नहीं किया गया है और E 20 का उपयोग करते समय इंजन की क्षति, क्षरण या प्रदर्शन में कमी का अनुभव हो सकता है.
याचिका में बताया गया है कि 2023 से पहले निर्मित कार और दोपहिया वाहन E-20 के लिए उपयुक्त नहीं है. कुछ बीएस-VI मॉडल भी इससे प्रभावित हो सकते हैं. इससे इंजन में जंग, माइलेज में कमी और वाहन की प्रदर्शन क्षमता पर असर पड़ सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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