वर्ष 2023 में वन संरक्षण (अधिनियम) एक्ट में किए गए संशोधन के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जल्द सुनवाई को तैयार हो गया है. याचिकाकर्ता के अनुसार 2023 में किए गए वन संरक्षण (अधिनियम) में संशोधन के बाद हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर में लगातार पर्यावरण की स्थिति बिगड़ रही है.
भूस्खलन व अन्य आपदाएओं किया गया जिक्र
सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले को जल्द सूचिबद्ध करने का आश्वासन दिया है. दायर याचिका में भूस्खलन और अन्य आपदाएं का जिक्र किया गया है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चेतावनी देते हुए कहा था कि वह उसके द्वारा दी गई वनों के परिभाषा के अनुरूप ही जंगलों में अपनी गतिविधियां सुनिश्चित करें.
यह याचिका अशोक कुमार शर्मा , भारतीय वन सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारियों, वन शक्ति और गोवा फाउंडेशन की ओर से दायर की गई है. दायर याचिका में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के असंतुष्ट सदस्यों की उन चिंताओं को भी ध्यान में रखा गया है, जिन्होंने संशोधनों की जांच की थी.
1980 के बाद जंगल घोषित इलाकों को छूट
नए संशोधन में कहा गया है कि वह इलाके जो सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 25 अक्टूबर 1980 के बाद जंगल घोषित किए गए उन्हें अधिनियम के दायरे में छूट दी जाएगी. ये सभी छूटें सुप्रीम कोर्ट के 2996 में दिए गए उस फैसले को अप्रभावी बनाती है, जो सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हर प्रकार के जंगल के लिए कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करती थी.
वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 में संसद में पारित किया गया. तब यह विवाद हुआ था कि केंद्र स्थाई समिति की अवहेलना कर विधेयक को जेपीसी के पास भेज अपना उद्देश्य आसानी से पूरा कर रहा है. बता दें कि 19 फरवरी 2024 को सुप्रीम कोर्ट रिपोर्ट देने को कहा था.
1996 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि एक डीम्ड वन शब्द कोष में वन की परिभाषा ही शामिल नहीं करता, बल्कि उस इलाके को भी शामिल करता है, जो सरकारी रिकॉर्ड में जंगल के रूप में पंजीकृत किया गया है.
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-भारत एक्सपेस
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