सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून (POSH Act 2013) के दायरे में लाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. सीजेआई बी. आर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश दिया है. मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने दलील दी कि यह मामला केरल हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि कानून में पीड़ित महिला की परिभाषा बहुत व्यापक है. चाहे वह महिला नियोजित हो या न हो. ऐसे में राजनीतिक दलों को भी इस कानून के तहत शामिल किया जाना चाहिए. इसपर सीजेआई बी आर गवई ने कहा कि राजनीतिक दलों को कार्यस्थल कैसे माना जा सकता है? जब कोई सदस्य पार्टी से जुड़ता है तो यह नौकरी नहीं होती. जबकि याचिकाकर्ता के वकील शोभा गुप्ता ने कहा कि राजनीतिक दल एक संगठन है और उन्हें इस दायरे में लाया जा सकता है.
सीजेआई ने अपने आदेश में कहा कि अगर ऐसा किया गया तो यह ब्लैकमेलिंग का पेंडोरा बॉक्स खोल देगा. यह याचिका योगमाया एमजी ने दायर की थी. इससे भी इन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील शोभा गुप्ता ने कहा था कि केरल हाई कोर्ट का एक फैसला है, यह किसी भी विषय पर कानून बनाने के लिए नहीं है. इससे पहले कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चुनाव आयोग जाने की सलाह दिया था. जिसके बाद यह याचिका दोबारा दायर की गई थी. याचिका में राजनीतिक दलों को यौन उत्पीड़न विरोधी कानून के तहत शामिल करने की मांग की गई थी.
याचिका में कांग्रेस, बीजेपी और अन्य दल शामिल
याचिका में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी को पार्टी बनाया गया था. जनहित याचिका में यह भी घोषित करने की मांग की गई थी कि राजनीतिक दल कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम 213 के तहत कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य है. साथ ही इसमें विशाखा बनाम राजस्थान मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत निवारण तंत्र गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी.
कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा अनिवार्य
बता दें कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के बाद दिशा निर्देश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा निर्देश के अनुसार 31 दिसंबर तक सभी राज्य सरकारें हर जिले में POSH से जुड़े मामलों को देखने के लिए अधिकारी नियुक्त करें, जिला स्तरीय अधिकारी 31 जनवरी 2025 तक लोकल कम्प्लेंट कमिटी बनाए, तहसील स्तर पर भी नोडल अधिकारियों की नियुक्ति हो, नोडल अधिकारियों और लोकल कम्प्लेंट कमिटी का ब्यौरा शीबॉक्स पोर्टल पर डाला जाए. जिलाधिकारी सरकारी और निजी संस्थानों में POSH एक्ट की धारा 26 के तहत आंतरिक शिकायत समिति के गठन को लेकर सर्वे करें और हर सरकारी दफ्तर में अनिवार्य रूप से ICC का गठन हो. कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 को संक्षेप में POSH एक्ट कहा जाता है.
इस कानून का उद्देश्य कामकाजी महिलाओं के लिए उनके कार्यालय में सुरक्षित माहौल बनाना है. इस कानून में किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न को लेकर महिला कर्मचारियों की शिकायत सुनने के लिए हर दफ्तर में इंटरनल कम्प्लेंट कमेटी का प्रावधान है. इस कमिटी को जांच और कार्रवाई को लेकर व्यापक अधिकार दिए गए हैं. इसके अलावा हर जिले में प्रशासन की भी भूमिका ऐसे मामलों को लेकर तय की गई है.
Also Follow Bharat Express on X
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

