भारत के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई (CJI BR Gavai) का आज आखिरी दिन हैं. उनके रिटायरमेंट पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित सेरेमोनियल कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ न्यायाधीश, वरिष्ठ वकील और जूनियर वकील मौजूद थे. इस दौरान सीजेआई गवई ने अपनी अनुभव को साझा किया.
हर धर्म में विश्वास: सीजेआई
सीजेआई बी आर गवई ने अपने विदाई समारोह में कहा कि न्यायपालिका कभी एक व्यक्ति पर केंद्रित नही होनी चाहिए, चाहे वो सीजेआई ही क्यों न हो. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम के दौरान सीजेआई ने कहा कि देश की न्यायपालिका ने उन्हें बहुत कुछ दिया है.
उन्होंने आगे कहा कि मैं बौद्ध धर्म का पालन करता हूं, लेकिन मुझे धार्मिक पढ़ाई या धर्म से जुड़ी गहरी जानकारी ज्यादा नहीं है. मैं वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हूं और मैं हिंदू धर्म, सिख धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म सबमे विश्वास रखता हूं. मैन यह अपने पिता से सिखा है. वह धर्मनिरपेक्ष और डॉ. अंबेडकर के अनुयायी थे. बड़े होते हुए जब हम उनके साथ राजनीतिक समारोहों में जाते थे और उनके दोस्त कहते थे, यहां आओ, यहां की दरगाह प्रसिद्ध है, या यहां का गुरुद्वारा प्रसिद्ध है, तो हम जाते थे.
स्वतंत्रता, न्याय और समानता कार्यप्रणाली का आधार
सीजेआई गवई ने 4 नवंबर को कहा था कि लोकतंत्र के तीनों अंग कार्यपालिका, अदालत और संसद ये तीनों मिलकर जनता के कल्याण के लिए काम करते हैं, कोई भी अकेले काम नहीं कर सकता. स्वतंत्रता, न्याय और समानता के सिद्धांत भारतीय संविधान में हैं, जो हर संस्था की कार्यप्रणाली का आधार हैं.
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के पास न तो तलवार की ताकत है और न ही शब्दों की. ऐसे में जनता का विश्वास ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. कार्यपालिका की भागीदारी के बिना न्यायपालिका और कानूनी शिक्षा को पर्याप्त बुनियादी ढांचा देना कठिन है.
सीजेआई गवई ने देश के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए कई ऐसे फैसले दिए है, जो फैसला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है. उन्होंने राष्ट्रपति और राज्यपाल की समय सीमा को लेकर सबसे बड़ा फैसला दिया है. संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे गवई ने अपने फैसले में कहा राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए बिल पर निर्णय के लिए समयसीमा तय नही किया जा सकता है. उन्होंने कहा राज्यपाल के पास तीन विकल्प हैं या तो मंजूरी दें, या बिलों के लिए दोबारा विचार के लिए भेजे या उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजे. राज्यपाल विधेयक को कानून बनाने के बीच सिर्फ एक रबर स्टैम्प नहीं है.
समय सीमा में बांधना संविधान की भावना के विपरीत
कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्यपाल की तरफ से फैसला लेने में देरी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट बिल को अपनी तरफ से मंजूरी नहीं दे सकता. प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपनी राय देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200/201 के तहत कोर्ट बिल पर फैसला लेने के लिए राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा कि विधेयक पर फैसला लेने के लिए उन्हें समय सीमा में बांधना संविधान की भावना के विपरीत होगा. उन्होंने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट 2021 के प्रावधानों को रद्द कर दिया है.
कोर्ट ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले को पलटने का एक असंवैधानिक प्रयास था. जो न्यायिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता था. इसके अलावे सीजेआई बनने से पहले उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई को लेकर बड़ा फैसला दिया था.
ये भी पढें: Delhi Riots Case: दिल्ली पुलिस ने कहा कि जब बुद्धिजीवी आतंकवादी बन जाते है, तो वो और खतरनाक हो जाते हैं
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


