आज जब हम 5 दिसंबर की तारीख देखते हैं, मन अपने आप उस महान ऋषि की ओर उठता है जिन्होंने भारत की स्वाधीनता-साधना को भी उतनी ही गहराई से जिया जितनी गहराई से उन्होंने मानव-चेतना के अन्तर्जगत को खोजा. श्री अरविंद घोष, जिन्हें बाद के वर्षों में विश्व ने “महर्षि अरविंद (Maharishi Arvind)” के नाम से जाना, उनका महासमाधि दिवस आज पूरा 75 वर्ष पूरे कर रहा है. 5 दिसम्बर 1950 को पुदुच्चेरी में जब उनका दिव्य शरीर इस भौतिक जगत से विदा हुआ, तब भी उनकी चेतना समूची मानवता के भीतर एक नई क्रांति की लहर बनकर फैल रही थी.
क्रांति के रास्ते पर
1972 में जन्मे अरविंद (तब उनका नाम अरविंद अक्रॉयड घोष था) कैंब्रिज से बैरिस्टरी लेकर लौटे थे. परन्तु उन्होंने वकालत नहीं, वंदे मातरम् का नारा चुना. “बन्दे मातरम्” पत्रिका के संपादक भूपेन्द्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानन्द के भाई) के साथ मिलकर उन्होंने बंगाल में गुप्त क्रान्तिकारी संगठन खड़े किए. अनुशीलन समिति, युगांतर आन्दोलन, अलीपुर बम काण्ड. इन सबके पीछे एक ही मस्तिष्क और एक ही आत्मा थी, वो श्री अरविंद की. जेल में बंद होने पर भी उन्होंने कहा था, “यह कारावास मेरे लिए तपोवन है.” और ठीक यही वह मोड़ था जहां बाहरी क्रांति भीतरी क्रांति में बदल गई.
योगी का जन्म
अलीपुर जेल में एक वर्ष के एकांवास में उन्हें तीन बार भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए. बाहर निकले तो वे क्रांतिकारी से योगी बन चुके थे. 1910 में वे चन्द्रनागोर से फ्रांसीसी इलाके पुदुच्चेरी पहुंचे और वहीं जीवन-पर्यन्त रहे. 1925 में उन्होंने पूर्ण योग की साधना में लीन होकर साधारण जन-सम्पर्क भी बं कर दिया. उनके साथ मां (मिर्रा अल्फासा) थीं, जिन्होंने आश्रम को विश्व-स्तरीय आध्यात्मिक केंद्र बनाया.
समग्र योग : मानव-उत्क्रान्ति का नया विज्ञान
श्री अरविंद का योग न तो केवल आसन-प्राणायाम था, न ही केवल निर्गुण ब्रह्म की खोज. उन्होंने “पूर्णयोग” या “समग्र योग” की घोषणा की, जिसमें
– कर्मयोग,
– ज्ञानयोग,
– भक्तियोग और
– राजयोग
सब एक साथ सधते हैं.
उनका कहना था कि मानव-चेतना अभी विकास की एक सीढ़ी पर है. अगली सीढ़ी “सुपरमाइंड” या “सत्य-चित्” की है. यह कोई कल्पना नहीं, विकास का अगला चरण है. “द लाइफ डिवाइन”, “द सिन्थेसिस ऑफ योगा”, “सावित्री” जैसे महाकाव्य-ग्रन्थ इसी दर्शन के साक्षी हैं. “सावित्री” तो 20,000 पंक्तियों के साथ विश्व का सबसे लम्बा अंग्रेजी महाकाव्य है, जिसमें मृत्यु पर विजय की कथा के भीतर समूची मानव-यात्रा समाई है.
राष्ट्र और विश्व के लिए संदेश
श्री अरविंद ने कभी राष्ट्र को संकुचित अर्थों में नहीं देखा. 15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ, उन्होंने रेडियो पर पांच मिनट का संदेश दिया था जिसमें कहा था , “भारत का पुनर्जन्म हो चुका है. अब उसे विश्व-मानवता के आध्यात्मिक नेतृत्व का दायित्व निभाना है.”
वे चाहते थे कि भारत केवल राजनीतिक रूप से नहीं, चेतना के स्तर पर विश्व-गुरु बने.
आज भी प्रासंगिक
आज जब विश्व भौतिकवाद के चरम पर पहुंचकर अंदर से खोखला हो रहा है, मानसिक तनाव, पर्यावरण-संकट और नैतिक पतन चारों ओर फैले हैं. तब श्री अरविंद का संदेश और भी प्रखर हो उठता है. वे कहते थे, “मानव को दिव्य मानव बनना है.” यह कोई धार्मिक उन्माद नहीं, विकास का वैज्ञानिक सत्य है.
5 दिसम्बर 1950 को जब उन्होंने शरीर छोड़ा, तब आश्रम में बिजली गुल हो गई थी, आकाश में सुनहरी रोशनी फैल गई थी और एक सुपरमाइंड का प्रतीक चिह्न बादलों में दिखाई दिया था. यह साक्ष्य उनके शिष्यों ने दर्ज किया है. शरीर गया, पर चेतना आज भी जीवंत है.
महर्षि अरविंद का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची क्रांति बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होती है. जब तक हम अपने भीतर के अंधकार पर विजय नहीं पा लेते, बाहर की कोई भी स्वतंत्रता पूर्ण नहीं हो सकती.
उनकी सावित्री आज भी गा रही है , “ओ मृत्यो, मैं तेरी विजयिनी हूं.”
ये भी पढ़ें: उत्तर भारत में ठंड ने बढ़ाई परेशानी, दिल्ली से लेकर बिहार तक गिरे तापमान; कई जगह कोहरा छाया
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.




