पटना की गलियों में बड़ा होने वाले अभय कुमार सिंह ने कभी कल्पना भी नहीं किया होगा कि एक दिन वह रूस के कुर्स्क क्षेत्रीय विधानसभा में बैठेंगे, जहां ठंडी हवाओं के बीच वह भारत-रूस संबंधों की मजबूती का प्रतीक बनेंगे. 1991 में, जब सोवियत संघ अपनी आखिरी सांसें ले रहा था, अभय सिंह ने पटना के लोयोला स्कूल से पढ़ाई पूरी कर रूस का रुख किया. मेडिकल की पढ़ाई के लिए निकला यह सफर, एक अविश्वसनीय कहानी में बदल गया. एक कहानी जो मेहनत, अनुकूलन और दो देशों के बीच गहरे बंधन की है.
रूस का आकर्षण
उस समय रूस में सब कुछ बदल रहा था. तापमान माइनस 25-30 डिग्री तक गिर जाता, दुकानों पर लंबी-लंबी कतारें लगतीं और सामान के लिए टिकट लेना पड़ता चाहे वह टेलीविजन हो या रोटी. अभय ने इन चुनौतियों का सामना किया. सोवियत संघ के विघटन को करीब से देखा, 90 के दशक की आर्थिक अराजकता झेली. लेकिन वह टूटे नहीं. मेडिसिन की डिग्री पूरी करने के बाद वह भारत लौटे, पटना में कुछ समय प्रैक्टिस की पर रूस का आकर्षण छोड़ न सके. 2000 के दशक में वह फिर लौटे, इस बार फार्मास्यूटिकल बिजनेस शुरू करने. कोरस्क शहर में बस गया, जहां उसने दवाओं का कारोबार बढ़ाया, फिर रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन में कदम रखा.
प्रेरणा बने पुतिन
अभय सिंह की जिंदगी में टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने व्लादिमीर पुतिन को देखा. सोवियत संघ के बाद के अस्थिर दौर में पुतिन का उदय हुआ, और अभय को लगा कि यह वह नेता हैं जो रूस को मजबूत बना सकता है. पुतिन ने रूस को अमेरिका के बराबर खड़ा कर दिया. 2015 में उन्होंने यूनाइटेड रूस पार्टी जॉइन की—वही पार्टी जो पुतिन की सत्ता की रीढ़ है. राजनीति में कदम रखना आसान न था. एक विदेशी मूल के व्यक्ति के लिए रूसी राजनीति में जगह बनाना किसी चमत्कार से कम न था. लेकिन अभय ने भारतीय स्टाइल अपनाया—घर-घर जाकर लोगों से मिलना, उनकी समस्याएं सुनना. 2017 में पहली बार कोरस्क क्षेत्रीय विधानसभा के लिए चुने गए, और 2022 में दोबारा. आज वह ‘डेप्युटेट’ हैं. भारत के विधायक के समान पद और रूस में पहले भारतीय मूल के विधायक हैं.
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
रूस में रहते हुए भी अभय सिंह का दिल हिंदुस्तानी है. राज कपूर का गाना उनके लिए अभी भी सच्चा लगता है: “सर पर लाल टोपी रूसी… फिर भी दिल है हिंदुस्तानी.” वह केवल भारतीय खाना खाते हैं—घर पर दाल-रोटी, चावल-सब्जी. बाहर रूसी भोजन खाते हैं, लेकिन बीफ से परहेज करते हैं. उनकी जड़ें पटना से जुड़ी हैं. उनके पिता किशोर सिंह इंजीनियर थे, मां इंदु सिन्हा. दो भाई, दो बहनें, और खुद की दो बेटियां. 2022 में वह अपने पैतृक गांव पिनराथु कला (सीवान, बिहार) लौटे, जहां ग्रामीणों ने उनका स्वागत किया. “मैं डेप्युटेट हूं, लेकिन गांव को कभी नहीं भूल सकता,” उन्होंने कहा.
व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के अभय सिंह की कहानी फिर सुर्खियों में है. वह भारत-रूस संबंधों के मजबूत समर्थक हैं. हाल ही में उन्होंने सुझाव दिया कि भारत को रूस की सबसे उन्नत S-500 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदनी चाहिए. “यह नवीनतम तकनीक है, चीन को भी नहीं मिली. S-400 अच्छा है, लेकिन S-500 भारत को मजबूत बनाएगा. साथ ही सुखोई-57 फाइटर जेट भी शानदार है,” अभय ने कहा. ब्रह्मोस मिसाइल और अन्य हथियारों की सफलता का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि रक्षा सहयोग दोनों देशों के लिए फायदेमंद है.
अवसरों की कहानी
अभय कुमार सिंह की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि अवसरों की है. रूस में वह ‘अमेरिकी ड्रीम का रूसी संस्करण’ हैं जो मेहनत करने वाले को जगह देता है. पटना से कुर्स्क तक का यह सफर भारत-रूस मित्रता का जीता-जागता प्रमाण है.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.



