जब हम झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता की बात करते हैं, तो चतरा जिले का ‘तमासिन जलप्रपात’ जेहन में सबसे पहले आता है. घने जंगलों के बीच, सफेद दूध जैसी लहरें जब काली चट्टानों से टकराती हैं, तो नजारा वाकई किसी जन्नत जैसा लगता है. यही वजह है कि नए साल की पिकनिक हो या मकर संक्रांति, यहां झारखंड ही नहीं बल्कि बिहार और बंगाल से भी हजारों की भीड़ उमड़ती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आंखों को सुकून देने वाली यह खूबसूरती असल में एक ‘डेथ ट्रैप’ यानी मौत का जाल भी है?
जिंदगी से हाथ धोने का डर
तमासिन जलप्रपात जितना सुंदर है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक. यहां की चट्टानें इतनी चिकनी और फिसलन भरी हैं कि एक छोटी सी चूक आपको सीधे गहरे पानी के कुंड में ले जा सकती है. स्थानीय प्रशासन ने इसे ‘डेंजर जोन’ घोषित कर रखा है, फिर भी हर साल यहां कई परिवारों के चिराग बुझ जाते हैं.
सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां आने वाले सैलानी उत्साह में झरने के बिल्कुल करीब जाकर सेल्फी लेते हैं. पैर फिसला नहीं कि सीधे सैकड़ों फीट गहरे पानी में समा गए. ताज्जुब की बात यह है कि इतनी भीड़ और मौतों के बावजूद यहां न तो कोई लाइफगार्ड तैनात है, न ही एनडीआरएफ (NDRF) या पुलिस की कोई स्थायी टीम. हादसा होने पर घंटों इंतजार करना पड़ता है, और तब तक अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.
मातंग ऋषि और बंद गुफा का रहस्य
प्राकृतिक आकर्षण के अलावा, तमासिन की धार्मिक महत्ता भी बहुत गहरी है. कहा जाता है कि यह महान मातंग ऋषि का आश्रम हुआ करता था. यहां एक प्राचीन गुफा है, जिसमें मां तमसा देवी का वास है. स्थानीय लोगों की अटूट आस्था है कि यहां मन्नत मांगने से संतान की प्राप्ति होती है और हर मनोकामना पूरी होती है.
मंदिर के पुजारी उमेश कुमार भोक्ता एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं. वे बताते हैं कि “पुराने समय में माता भक्तों की जरूरत पर उन्हें बर्तन तक दिया करती थीं, लेकिन एक लालची इंसान की वजह से माता ने गुफा का द्वार बंद कर लिया.” पहले यह गुफा 2 किलोमीटर लंबी थी, जो अब सिमट कर 50-60 फीट रह गई है. पुजारी जी भी सुरक्षा व्यवस्था न होने से दुखी हैं. वे बताते हैं कि झरने के नीचे पानी इतना गहरा है कि एक बार डूबे हुए व्यक्ति को खोजने के लिए जब एनडीआरएफ ने 500 फीट तक मशीन डाली, तो मशीन ने भी काम करना बंद कर दिया था.
सरकारों के वादे
तमासिन को लेकर झारखंड सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे. इसे पर्यटन सर्किट से जोड़ने का ऐलान हुआ था, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला. सुरक्षा के लिए जो रेलिंग लगी थी, वह बाढ़ के बहाव में बह गई. आज विकास के नाम पर सिर्फ वो 316 सीढ़ियां हैं, जो वन विभाग ने करीब 15 साल पहले बनवाई थीं. बिहार के जमुई से आए सैलानियों का कहना है कि यहाँ साफ-सफाई और सुरक्षा का कोई नामोनिशान नहीं है.
क्या इस बार बदलेगी सूरत?
जब इस बदहाली पर चतरा के DDC अमरेंद्र कुमार सिन्हा से बात की गई, तो उन्होंने माना कि जगह खतरनाक है. उन्होंने कहा, “हम पर्यटन सेल का गठन कर रहे हैं और DMFT फंड के जरिए इसके कायाकल्प की योजना बना रहे हैं.” उन्होंने सैलानियों से अपील की कि वे जान जोखिम में डालकर गहरे पानी में न जाएं.
-भारत एक्सप्रेस
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