सुंदर मुंदरिए तेरा कौन विचारा, दुल्ला भट्टीवाला
दुल्ले दी धी व्याही, सेर शक्कर पायी
कुड़ी दा लाल पताका…
पंजाब में सदियों से लोहड़ी के त्योहार पर इस गीत को गाते हुए लोग अपने उस रक्षक दुल्ला भट्टी को याद करते हैं, जो मुसलमान होते हुए भी दो हिंदू लड़कियों सुंदरी और मुंदरी को मुगल सौदागरों से ना सिर्फ बचाया था, बल्कि उनकी खुद शादी भी कराई थी.
पंजाब के सांदल बार इलाके में मुगल जागीरदार ने दो ब्राह्मण कन्याओं सुंदरी और मुंदरी को उठा लिया था. आज के समय में यह जगह पाकिस्तान के मुल्तान शहर के पास मौजूद है. जहां दुल्ला भट्टी मुगलों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे.

लोक गीत के तौर पर गाई जाने वाली यह कहानी दुल्ला भट्टी के बारे में बताती है कि उन्होंने किस तरह से लड़कियों को आजाद कराया. उस समय किसी मुसलमान का हिंदू के पक्ष में खड़े होना वो भी किसी लड़की के हक के लिए बड़ी बात होती थी.
क्या है दुल्ला भट्टी की कहानी?
यह कहानी 16वीं सदी की है. उस समय दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह अकबर तख्तनशीं था. दुल्ला भट्टी के जन्म से 4 महीने पहले उनके पिता की मौत हो गई थी. उनके पिता फरीद खान भट्टी सांदल बार के एक मुस्लिम राजपूत जागीरदार थे. अकबर के खिलाफ उस इलाके के जागीरदारों ने जंग छेड़ रखी थी, क्योंकि मुगल दरबार ने जमीन का लगान सरदारों की जगह खुद लेना शुरू कर दिया था. जिसको लेकर इलाके के जागीरदार खुश नहीं थे.
फरीद खान की बगावत से मुगल बेहद नाराज थे. उन्होंने बगावत को कुचलकर फरीद खान को सरेआम फांसी दे दी थी. इसके अलावा फरीद खान की सारी जागीर जब्त कर ली. जब दुल्ला भट्टी बड़े हुए तो उनकी मां ने पिता की मौत की सारी दास्तान सुनाई. जिसके बाद दुल्ला ने भी मुगलों के खिलाफ छापेमार युद्ध छेड़ दिया. वो मुगल जागीरदारों के खजानों को लूटकर गरीबों में बांट देते थे. जिसकी वजह से लोग उन्हें रॉबिनहुड कहते हैं. उनके कारनामों की वजह से लोग उनके जिंदा रहते ही गीत बनाना शुरू कर दिये थे.
मुगलों ने मां को बना लिया बंदी
दुल्ला भट्टी की बगावत अकबर को नागवार गुजरी. उसने फौज भेजकर दुल्ला को पकड़ने के लिए भेजा. जब दुल्ला भट्टी मुगल फौज के हाथ नहीं आए तो मुगलों ने उनकी मां और उनके कबीले की महिलाओं को बंदी बना लिया.
पंजाब के बारे में लिखने वाले इतिहासकार बताते हैं कि दुल्ला भट्टी की जांबाजी से मुगल सेना खौफ में थी. मां को बंदी बनाने के बाद मुगल सरदारों ने उन्हें सुलह के लिए बुलाया. बताया जाता है कि इसी दौरान धोखे से दुल्ला भट्टी को मुगल सैनिक पकड़ लिए. साल 1599 में दुल्ला को लाहौर कोतवाली के सामने फांसी पर लटका दिया.
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मात्र 30 साल की उम्र में फांसी
फांसी पर चढ़ते समय दुल्ला की उम्र मात्र 30 साल थी. इतिहासकारों के अनुसार दुल्ला भट्टी का अंतिम संस्कार सूफी संत शाह हुसैन ने की. जिसके लिए उन्हें भी फांसी पर चढ़ा दिया गया.
दुल्ला भट्टी की मौत के आज 400 साल से ज्यादा समय बीत चुके हैं, लेकिन उनकी कहानी पंजाब के मानस में आज भी जिंदा है.
-भारत एक्सप्रेस
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