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इलाहाबाद पैसेंजर: 90 के दशक के छात्र-जीवन का जीवंत दस्तावेज

यह उपन्यास उन संकरी गलियों और 75 पैसे वाली चाय की खुशबू की वापसी है, जहाँ भविष्य गढ़ा जाता था. ‘इलाहाबाद पैसेंजर’ महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि 1990 के दशक के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उस दौर की जीवंत धड़कन है.

Allahabad Passenger book review
Edited by Vaibhav Gupta

‘इलाहाबाद पैसेंजर’ डॉ. संजीव राय का पहला उपन्यास है, जो हाल ही में (जनवरी 2026 में) मंजुल इंडिया से प्रकाशित हुआ और नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में लॉन्च किया गया. यह किताब महज एक कहानी नहीं, बल्कि 1990 के दशक के इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उन छात्र-जीवनों की जीवंत स्मृति है, जो छोटे शहरों-गाँवों से सपनों की पैसेंजर ट्रेन पकड़कर आए थे. लेखक, जो खुद दिल्ली टीचर्स यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार हैं और शिक्षाविद्-डेवलपमेंट प्रोफेशनल हैं, ने अपने अनुभवों को इस उपन्यास में इतनी प्रामाणिकता से उकेरा है कि पढ़ते हुए लगता है कि ये मेरी/हमारी कहानी है.

पढ़ाई सिर्फ डिग्री नहीं

उपन्यास का केंद्र हरि प्रताप (एच.पी.) है, लेकिन वह अकेला नहीं. उसके साथ चलते हैं सुरेश, रणविजय, तिवारी, समर और दर्जनों ऐसे चेहरे, जिनकी जेब में पचास रुपये, पेट में भूख, और दिल में अनंत आकाश होता था. ये वे युवा हैं जिनके लिए पढ़ाई सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि परिवार की उम्मीदों का बोझ थी. मोबाइल नहीं थे, पीसीओ के सिक्के गिरते थे; लल्ला चुंगी पर चाय पीते हुए हॉस्टल की लड़कियों को देखना रोमांच था. यूनिवर्सिटी रोड पर 75 पैसे की चाय और बन-मक्खन में पूरी दुनिया समा जाती थी. दारागंज, सोहबतियाबाग, कटरा, मम्फोर्डगंज के संकरे कमरों से निकली वह पीढ़ी, जिसने देश की नौकरशाही और बुद्धिजीवी वर्ग को जन्म दिया.

अंग्रेजी के दबाव में पिसती हिंदी

भाषा इस किताब की सबसे बड़ी ताकत है. भोजपुरी की लचक, देशज शब्दों की खनक (‘बकलोल’, ‘बकैत’, ‘भौकाली’), और अंग्रेजी के दबाव में पिसती हिंदी. यह ठीक वही जुबान है जो उस दौर के कैंपस में गूंजती थी. लेखक ने इसे न सिर्फ सुरक्षित रखा, बल्कि उसकी मिठास और कड़वाहट दोनों को जीवंत किया.

कहानी में नॉस्टैल्जिया तो भरपूर है, लेकिन यह सिर्फ यादों का सिलसिला नहीं. इसमें गहरी पीड़ा है, एच.पी. के पिता का लापता होना, परिवार की विपत्ति, आर्थिक संघर्ष, सपनों का बिखरना. रागिनी के साथ प्रेम भी महज रोमांस नहीं, बल्कि वर्ग, जाति और सामाजिक दीवारों से टकराता हुआ अहसास है. ‘अलविदा’ शब्द जितना छोटा, उसमें उतनी ही गहरी चुभन.

हास्य भी है, लेकिन वह संघर्ष से उपजा हुआ, जब जिंदगी कठिन हो, तो ह्यूमर ही बचाव का हथियार बन जाता है. मंडल आंदोलन, छात्रसंघ चुनाव, लाठीचार्ज जैसी घटनाएँ पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि कहानी की सांस में घुली हुई हैं, जो बिना उपदेश दिए, बस गवाही देती हुईं.

लड़कपन से जवानी तक ले जाने वाली ट्रेन

‘इलाहाबाद पैसेंजर’ उन सभी के लिए है जो कभी छोटे कस्बे से शहर आए, जिन्होंने डेलीगेसी के कमरों, मेस की दाल-चावल और दोस्तों की चिंताओं में असली शिक्षा पाई. यह उपन्यास बताता है कि कुछ ट्रेनें हमारे सिर्फ जगह नहीं बदलतीं, बल्कि वे हमें लड़कपन से जवानी, सपनों से यथार्थ तक ले जाती हैं.

एक पूरे युग की धड़कन है यह किताब. वह युग अब इतिहास बन गया, लेकिन इसकी अनुगूंज आज भी हर उस युवा के सीने में गूंजती है जो अपने गाँव से निकलकर शहर में अपनी जगह तलाश रहा है.

क्यों पढ़ें?

अगर आप इलाहाबाद/प्रयागराज से जुड़े हैं. 90 के दशक के कैंपस लाइफ को समझना चाहते हैं, या बस एक ईमानदार, संवेदनशील हिंदी उपन्यास पढ़ना चाहते हैं, तो यह आपके लिए है.



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