फर्जी शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने यूजीसी सहित अन्य को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ ने इसे गंभीर मुद्दा बताया है. कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि ऐसे फर्जी संस्थानों की ओर से आकर्षित होने वाले आमतौर पर छोटे शहरों से आते है, और वो अपना समय और संसाधन खर्च करते हैं, लेकिन अंत मे उन्हें ऐसी डिग्रियां मिलती है, जो रोजगार दिलाने में मददगार नहीं होती.
कोर्ट ने यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता शशांक देव सुधि की ओर से दायर जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए की है. कोर्ट ने केंद्र सरकार, यूजीसी और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद को हलफनामे के जरिये पूछा है कि ऐसे संस्थानों की बढ़ती संख्या रोकने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए है. कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली सरकार से भी जवाब मांगा है. दिल्ली सरकार ने राजधानी में चल रहे फर्जी विश्वविद्यालयों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई थी. कोर्ट ने पूछा है कि इस कमेटी ने अब तक क्या जानकारी जुटाई है और अवैध रूप से चल रहे ऐसे संस्थानों को बंद करने के लिए क्या कार्रवाई की गई है. कोर्ट इस मामले में 19 अगस्त में अगली सुनवाई करेगा.
फर्जी संस्थानों पर सख्त कार्रवाई की मांग तेज
सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि इस समस्या पर कड़ी कार्रवाई की जरूरत है और जनहित याचिका का दायरा बढ़ाकर मेडिकल, लॉ और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों को भी शामिल किया जाना चाहिए. दायर याचिका में मांग की गई है कि किसी रिटायर हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित कर यह जांच करने की मांग की गई है कि आखिर किन खामियों के कारण ऐसे फर्जी संस्थान लगातार संचालित हो रहे है.
याचिकाकर्ता के मुताबिक फर्जी विश्विद्यालय खुद को वैध संस्थान बताकर छात्रों को गुमराह करते है और उनके शैक्षिणक भविष्य, आर्थिक स्थिति तथा रोजगार के अवसरों को अपूरणीय नुकसान पहुंचाते है. दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि यूजीसी द्वारा बार-बार चेतावनी और सार्वजनिक सूचनाएं जारी किए जाने के बावजूद इन संस्थानों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नही की है.
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-भारत एक्सप्रेस
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