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धार भोजशाला मामला: जुमे की नमाज के लिए वैकल्पिक जमीन की मांग वाली याचिका पर SC में 24 जुलाई को सुनवाई

मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में जुमे की नमाज के लिए वैकल्पिक जमीन की दूरी को लेकर विवाद गहरा गया है. मुस्लिम पक्ष ने 2 किमी दूर जगह दिए जाने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार का दावा है कि दूरी महज 900 मीटर है. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट 24 जुलाई को अहम सुनवाई करेगा.

Dhar Bhojshala Case, Supreme Court
Edited by Radha Priya

Dhar Bhojshala Case: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला परिसर के पास जुमे की नमाज के लिए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराने से जुड़ी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 24 जुलाई को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष मुस्लिम पक्ष ने इस मामले का उल्लेख करते हुए जल्द सुनवाई की गुहार लगाई थी.

मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुफैजा अहमदी ने अदालत के सामने तर्क दिया कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक मुसलमानों को नमाज अदा करने के लिए जो दूसरी जगह दी गई है, वह भोजशाला परिसर से 2 किलोमीटर दूर है. अहमदी ने कहा कि जगह दूर होने के कारण वे पहले ही दो शुक्रवार से नमाज नहीं पढ़ पाए हैं और उन्हें इस मामले में अंतरिम राहत मिलनी चाहिए.

दूसरी ओर मध्य प्रदेश सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने इन दावों को खारिज करते हुए कोर्ट को बताया कि सरकार द्वारा दी गई वैकल्पिक जगह 2 किलोमीटर नहीं, बल्कि महज 900 मीटर की दूरी पर स्थित है.

सुप्रीम कोर्ट का रुख और सख्त निर्देश

सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वे राज्य सरकार से बातचीत कर परिसर के और पास कोई उपयुक्त जगह उपलब्ध कराने के संबंध में निर्देश प्राप्त करें. वहीं, पीठ के सदस्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने जोर देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश का अक्षरशः और उसकी मूल भावना के अनुरूप पालन होना चाहिए. अदालत ने दोहराया कि राज्य सरकार को एक ऐसी अंतरिम व्यवस्था करनी चाहिए जिससे दोनों पक्षों को कोई परेशानी न हो और नमाज भी शांतिपूर्वक अदा की जा सके.

मुस्लिम पक्ष का आरोप

मामले की बहस के दौरान वरिष्ठ वकील हुफैजा अहमदी ने कहा कि सन 1500 से जो स्थिति बनी हुई थी, उसे अचानक खत्म कर दिया गया और एकतरफा कार्रवाई की गई. उन्होंने आरोप लगाया कि इस आदेश को लागू करने में बहुत जल्दबाजी दिखाई गई.

मुस्लिम पक्ष की ओर से ही पेश एक अन्य वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय ने महज एक दिन के भीतर फैसला करते हुए एक समुदाय के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया. हालांकि, इन दलीलों पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या आपको लगता है कि इस तरह के तर्कों के आधार पर अदालत तत्काल फैसले पर रोक लगा देगी? वहीं, केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल ने मुस्लिम पक्ष की ओर से मांगी जा रही रोक या यथास्थिति बनाए रखने की मांग का कड़ा विरोध किया.

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हाई कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार

गौरतलब है कि धार स्थित भोजशाला परिसर को हिंदू पक्ष देवी वाग्देवी (मां सरस्वती) के मंदिर के रूप में मान्यता देता है. इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से एएसआई (ASI) की उस रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें परिसर के 188 मूल आधार स्तंभों (जिनमें 106 मुख्य स्तंभ और 8 अर्द्धस्तंभ शामिल हैं) का जिक्र किया गया था.

रिपोर्ट में दावा किया गया था कि इन स्तंभों पर हिंदू धर्म से जुड़े प्रतीक, देवी-देवताओं की आकृतियां और पारंपरिक मंदिर शैली की नक्काशी मौजूद है. इन्हीं वैज्ञानिक साक्ष्यों और तथ्यों को आधार बनाते हुए हाई कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया था.

इंग्लैंड से वाग्देवी की प्रतिमा लाने का निर्देश

इससे पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने परिसर के मूल ढांचे में किसी भी तरह के बदलाव पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था. इसके साथ ही कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी व्यवस्था दी थी कि यदि मस्जिद पक्ष सरकार को आवेदन देता है तो उसे नमाज के लिए अलग जमीन मुहैया कराई जाए, ताकि शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच नमाज पढ़ी जा सके. इसके अलावा, अदालत ने सरकार को इंग्लैंड में रखी वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस भारत लाने के प्रयास करने का भी सुझाव दिया था.

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-भारत एक्सप्रेस



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