इसी साल राजकमल प्रकाशन से बहुप्रतीक्षित पुस्तक “वैशाली की विरासत” प्रकाशित हुई. पटना किताब उत्सव में इसका विमोचन जावेद अख़्तर ने किया. यह पुस्तक महज एक क्षेत्रीय इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि वैशाली की गौरवशाली परंपरा, उसकी सांस्कृतिक गहराई और उन स्त्रियों की स्मृति का जीवंत साक्ष्य है, जिन्होंने समय के अंधेरों में स्वयं चिराग़ बनकर जलाया.
इस पुस्तक का स्वप्न लेखक-विचारक फणीश सिंह ने देखा था. उन्होंने वैशाली से जुड़ी सामग्री जुटाने और रूपरेखा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. दुर्भाग्य से वे इसे पूर्ण रूप में प्रकाशित होते नहीं देख सके. उनके अधूरे स्वप्न को वंदना राग ने खूब मेहनत और समर्पण से आकार दिया. संपादक द्वय के परिश्रम से यह पुस्तक चार खंडों में विभक्त होकर सामने आई है.
वैशाली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत
पुस्तक वैशाली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को गहराई से रेखांकित करती है. हजारी प्रसाद द्विवेदी का प्रसिद्ध कथन यहाँ विशेष रूप से याद आता है-“वैशाली ज्ञान, कर्म और जैन परंपरा की त्रिवेणी रही है. ज्ञानशक्ति, आत्मशक्ति और धनशक्ति की त्रिवेणी रही है. इतिहास गवाह है कि वैशाली केवल राजनीतिक या धार्मिक केंद्र नहीं था, बल्कि विचारों, कलाओं और स्त्री-स्वातंत्र्य का भी महत्वपूर्ण स्थल रहा.
दिग्गज लेखकों और इतिहासकारों का योगदान
पुस्तक में वैशाली के इतिहास के साथ-साथ उससे जुड़ी हस्तियों, कलाओं और साहित्यिक प्रस्तुतियों पर महत्वपूर्ण आलेख संकलित हैं. हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, जगदीशचन्द्र माथुर, अनामिका, विजय चौधरी, प्रो. एन. एन. ठाकुर जैसे दिग्गज इतिहासकारों और लेखकों के लेख इसमें शामिल हैं. उनके योगदान पर अलग खंड भी है.
अंतिम खंड विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां बेनीपुरी जी के नाटक ‘अंबपाली’ का अंश, आचार्य चतुरसेन के उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ का हिस्सा तथा अंबपाली (वाणी प्रकाशन) उपन्यास का अंश प्रकाशित है. युवा कवि सुधांशु फ़िरदौस की वैशाली-विषयक कविताएं और वैशाली की तस्वीरें पुस्तक को और समृद्ध बनाती हैं.
आम्रपाली की कहानी और स्त्री-शक्ति की आवाज
पुस्तक में आम्रपाली (अंबपाली) पर एक महत्वपूर्ण लेख भी है. वैशाली की चर्चा आम्रपाली के बिना अधूरी रह जाती. जनपद कल्याणी के रूप में वह उस स्त्री का प्रतीक है जिसने समय के कठोर दबावों के बीच अपनी गरिमा और व्यक्तित्व को बचाए रखा. उसकी मोहकता और विलक्षणता सदियों से लेखकों और कलाकारों को आकर्षित करती रही है. आज भी उसकी कहानी में आधुनिक स्त्री की प्रतिध्वनि सुनाई देती है-स्वाभिमान, बुद्धिमत्ता और आत्मनिर्णय की वह आवाज, जो समय की सीमाओं को पार कर जाती है.
विरासत का पुनर्पाठ क्यों जरूरी है?
वंदना राग ने ठीक ही लिखा है कि यह पुस्तक किसी एक क्षेत्र के प्रति प्रेम का परिसीमन नहीं करती. यह हमें हमारी विरासत से साक्षात्कार कराती है और याद दिलाती है कि समृद्ध इतिहास तथा धरोहरों को भूलना नहीं चाहिए. पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी विरासत का पुनर्पाठ करते रहना आवश्यक है. ‘वैशाली की विरासत’ ठीक यही काम करती है-वह अतीत को वर्तमान से जोड़ती है और भविष्य के लिए एक सांस्कृतिक स्मृति का आधार तैयार करती है.
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से मूल्यवान है जो इतिहास को केवल तिथियों और घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक प्रवाह के रूप में समझना चाहते हैं. वैशाली की यह विरासत अब नए पाठकों तक पहुंच रही है और यह सिलसिला जारी रहना चाहिए.
-भारत एक्सप्रेस
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