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कृष्ण हुए रात 12 बजे… तो राधारानी कब जन्मी? राधाष्टमी और राधा जन्माष्टमी में जान लें अंतर

राधाष्टमी पर राधारानी के प्राकट्य समय को लेकर श्रद्धालुओं में खास जिज्ञासा रहती है. वैष्णव परंपरा में उनका प्राकट्य मध्याह्न काल में माना जाता है.

Radharani

When was Radharani born: सनातन परंपरा में भगवान श्री कृष्ण और राधारानी का संबंध अभिन्न माना गया है. जहाँ कृष्ण जन्माष्टमी पर पूरे देश में कान्हा के जन्म का उत्सव भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात (12 बजे) बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, वहीं ठीक 15 दिन बाद भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को बरसाने की लाडली जी यानी राधारानी का प्राकट्य दिवस ‘राधाष्टमी’ के रूप में मनाया जाता है.

इस साल 19 सितंबर को पूरे ब्रज मंडल समेत देश भर के मंदिरों में श्रीजी का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है. लेकिन श्रद्धालुओं के मन में हमेशा यह जिज्ञासा रहती है कि अगर कान्हा का जन्म आधी रात 12 बजे हुआ था, तो ब्रज स्वामिनी राधारानी का जन्म सुबह, दोपहर या आधी रात… किस समय हुआ था?

किस समय हुआ राधारानी का जन्म?(When was Radharani born)

धार्मिक मान्यताओं और ब्रज की समृद्ध परंपराओं के अनुसार, राधारानी का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि को ब्रज के अति-पवित्र रावल गाँव में वृषभानु जी और माता कीर्ति के घर हुआ था. वैष्णव परंपराओं और ग्रंथों के अनुसार, राधारानी का प्राकट्य समय मध्याह्न काल यानी दोपहर 12 बजे माना गया है.

यही कारण है कि कृष्ण जन्माष्टमी की तरह रात 12 बजे नहीं, बल्कि राधाष्टमी के दिन दोपहर 12 बजे मंदिरों में शंखनाद, डमरू की गूंज और पञ्चामृत अभिषेक के साथ राधारानी के जन्मोत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है.

आधी रात के कान्हा और दोपहर की श्रीजी

आध्यात्मिक विद्वानों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ‘पूर्ण पुरुषोत्तम’ हैं और उनका जन्म भादों की अंधेरी रात (कृष्ण पक्ष) में कंस के अत्याचारों का अंत करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था. इसके विपरीत, राधारानी ‘आह्लादिनी शक्ति’ यानी प्रेम, प्रकाश और भक्ति की प्रतिमूर्ति हैं.

इसीलिए उनका प्राकट्य भादों के उजाले वाले पखवाड़े (शुक्ल पक्ष) में सूर्य के पूर्ण प्रकाश यानी दोपहर के समय हुआ. अंधकार को मिटाने कान्हा रात में आए, तो प्रेम का उजियारा फैलाने लाडली जी दोपहर में पधारीं.

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‘राधाष्टमी’ और ‘राधा जन्माष्टमी’ में क्या है असली अंतर?

आम लोगों में यह भ्रम रहता है कि राधाष्टमी और राधा जन्माष्टमी दो अलग-अलग पर्व हैं या एक ही. वास्तव में, ‘राधाष्टमी’ और ‘राधा जन्माष्टमी’ एक ही पावन पर्व के दो नाम हैं. राधारानी का प्राकट्य अष्टमी तिथि को होने के कारण इसे ‘राधाष्टमी’ कहा जाता है, जबकि जन्मोत्सव के संदर्भ में लोग इसे प्रेम से ‘राधा जन्माष्टमी’ भी कह देते हैं. हालांकि, भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव ‘कृष्ण जन्माष्टमी’ कहलाता है, जो कृष्ण पक्ष में आता है, जबकि राधारानी का पर्व शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है.

‘राधे-राधे’ के जयकारों से गुंजायमान ब्रज

राधाष्टमी के अवसर पर बरसाना, नंदगांव, वृंदावन, मथुरा और रावल गाँव में उत्सव का माहौल चरम पर है. बरसाना के विश्वप्रसिद्ध लाडली जी मंदिर में भोर से ही श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है. दोपहर 12 बजे दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और जड़ी-बूटियों से राधारानी का महाअभिषेक किया जाएगा, जिसके बाद लाडली जी को छप्पन भोग अर्पित किए जाएंगे. ब्रज की गलियों में गूंजते “राधे-राधे” के जयकारे और बधाई गीत सनातन संस्कृति की अटूट भक्ति परंपरा को जीवंत कर रहे हैं.

-भारत एक्सप्रेस



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