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आराम करते समय भी क्यों महसूस होता है तनाव? जानिए क्या है ‘Stresslaxing’ और इससे कैसे निपटें

Stresslaxing: लगातार काम, स्क्रीन टाइम और प्रोडक्टिव रहने के दबाव के बीच कई लोग फुर्सत के समय भी बेचैनी और अपराधबोध महसूस कर रहे हैं. आराम करने की कोशिश के दौरान तनाव महसूस करने की इस स्थिति को ‘Stresslaxing’ कहा जा रहा है, जिसे बेहतर रेस्ट और डिजिटल ब्रेक से संभाला जा सकता है.

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Stresslaxing- bharat express

Stresslaxing: लगातार काम, स्क्रीन टाइम और ‘हमेशा प्रोडक्टिव रहने’ की सोच के बीच अब आराम भी कई लोगों के लिए तनाव का कारण बनता जा रहा है. इसी अनुभव को सोशल मीडिया और वेलनेस चर्चाओं में ‘Stresslaxing’ कहा जा रहा है. दिनभर की भागदौड़ के बाद जब आखिरकार आराम करने का समय मिलता है, तो आमतौर पर उम्मीद होती है कि शरीर और दिमाग दोनों रिलैक्स होंगे. लेकिन कुछ लोगों के लिए ऐसा नहीं होता. सोफे पर बैठते ही काम की चिंता, अधूरे टास्क, फोन चेक करने की इच्छा या यह अपराधबोध सताने लगता है कि “मैं इस समय कुछ कर क्यों नहीं रहा?” यही स्थिति अब ‘Stresslaxing’ के नाम से चर्चा में है.

क्या है Stresslaxing?

‘Stresslaxing’ का मतलब है आराम करने की कोशिश के दौरान ही तनाव या बेचैनी महसूस होना. यानी व्यक्ति शारीरिक रूप से आराम कर रहा होता है, लेकिन उसका दिमाग लगातार सक्रिय रहता है. छुट्टी के दिन भी ईमेल, मैसेज या काम से जुड़े विचार दिमाग में घूमते रहते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार व्यस्त रहने की आदत और हर समय कुछ न कुछ हासिल करने का दबाव इस अनुभव को बढ़ा सकता है. ऐसे माहौल में खाली समय को भी लोग ‘अनप्रोडक्टिव’ मानने लगते हैं.

आराम करते समय क्यों बढ़ती है बेचैनी?

लंबे समय तक तनाव में रहने के बाद दिमाग को अचानक शांत होना आसान नहीं लगता. अगर किसी व्यक्ति की दिनचर्या लगातार काम, सोशल मीडिया और नोटिफिकेशन से भरी है, तो शांत बैठना उसके लिए असहज अनुभव बन सकता है. इसके अलावा, सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां देखने से भी तुलना और ‘मुझे भी कुछ करना चाहिए’ जैसी भावना पैदा हो सकती है. परिणाम यह होता है कि छुट्टी या फुर्सत का समय भी पूरी तरह आराम देने के बजाय मानसिक दबाव बढ़ा देता है.

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इससे निपटने के लिए क्या करें?

आराम को भी दिनचर्या का जरूरी हिस्सा मानना पहला कदम हो सकता है. कुछ समय के लिए फोन और काम से दूरी बनाना, हल्की वॉक करना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना या बिना किसी लक्ष्य के कुछ समय शांत बैठना मददगार हो सकता है. सबसे जरूरी बात यह समझना है कि हर समय प्रोडक्टिव रहना जरूरी नहीं है. अगर आराम करने पर भी लगातार बेचैनी बनी रहती है और इसका असर नींद, काम या रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है, तो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है.

भारत एक्स्प्रेस



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