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Explainer: एलन मस्क के स्टारलिंक विवाद में क्यों लिया जा रहा है मुंबई के 26/11 का नाम?

Starlink Elon Musk Controversy: एलन मस्क के स्टारलिंक को भारत में क्यों नहीं मिल रही सीधी हरी झंडी? जानिए मरीन ऑफिसर के इनपुट, डेटा सर्वर की शर्तें और मुंबई 26/11 के सैटेलाइट कनेक्शन की पूरी इनसाइड स्टोरी

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एलन मस्क के स्टारलिंक को भारत में क्यों नहीं मिल रही सीधी हरी झंडी?

Starlink Elon Musk Controversy: एलन मस्क की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा ‘स्टारलिंक’ (Starlink) को लेकर भारत में सियासी बहस छिड़ गई है. विवाद की शुरुआत तब हुई जब एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि भारत में स्टारलिंक को मंजूरी मिलने में रुकावटें आ रही हैं. इस पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत में स्टारलिंक का स्वागत है, लेकिन इसके लिए सरकार बदलने का इंतजार करना होगा. अब इस विवाद में 26/11 मुंबई आतंकी हमले का जिक्र इसलिए हो रहा है. आइये जानें आखिर क्यों?

मस्क के इस दावे और राहुल गांधी के सियासी बयान के बीच अब रक्षा और समुद्री क्षेत्र के जानकारों ने स्टारलिंक की एंट्री पर गंभीर सुरक्षा सवाल खड़े कर दिए हैं. अमेरिकन प्रेसिडेंट लाइन्स (APL) में मरीन 2nd ऑफिसर राहुल गौर विस्तृत विश्लेषण में बहुत कुछ समझाया है.

26/11 मुंबई हमले का सबक

स्टारलिंक पर भारत सरकार के कड़े रुख का सबसे बड़ा ऐतिहासिक संदर्भ 26 नवंबर 2008 का मुंबई आतंकी हमला है. उस दौरान पाकिस्तान से आए 10 लश्कर आतंकियों ने भारतीय सुरक्षा बलों से बचने और सीमा पार बैठे अपने हैंडलर्स से रियल-टाइम निर्देश लेने के लिए सैटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया था.

चूंकि सैटेलाइट सिग्नल सीधे अंतरिक्ष के जरिए जुड़े थे और उनका डेटा भारतीय टेलीकॉम नेटवर्क्स व घरेलू सर्विलांस के दायरे से बाहर था, इसलिए उस वक्त सुरक्षा एजेंसियों को उनकी बातचीत तुरंत इंटरसेप्ट करने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

विशेषज्ञों का कहना है कि स्टारलिंक भी सीधे लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स से काम करता है. यदि किसी विदेशी कंपनी को बिना स्थानीय डेटा गेटवे, बिना भारत में सर्वर और बिना सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी के सीधे सैटेलाइट इंटरनेट की अनुमति दी जाती है, तो यह देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए गंभीर जोखिम बन सकता है. कोई भी जिम्मेदार सरकार इतिहास की उस चूक को दोबारा नहीं दोहरा सकती.

विदेशी सर्वर, अनियंत्रित डेटा और जासूसी (National Security Starlink Elon Musk)

जमीन पर चलने वाले सामान्य इंटरनेट (4G, 5G या फाइबर ब्रॉडबैंड) में ट्रैफिक देश के अंदर लगे टेलीकॉम टावरों और घरेलू डेटा सेंटरों के जरिए रूट होता है. इसका सीधा मतलब यह है कि देश का डेटा देश की सीमाओं में सुरक्षित रहता है और भारतीय कानून व सुरक्षा एजेंसियां संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रख सकती हैं.

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इसके विपरीत, स्टारलिंक का नियंत्रण पूरी तरह अमेरिकी सैटेलाइट्स और विदेशों में स्थित ग्राउंड स्टेशनों व सर्वर्स से संचालित होता है. इससे डेटा संप्रभुता का खतरा खड़ा हो रहा है. भारतीय नागरिकों, प्रतिष्ठानों और रक्षा ठिकानों के डेटा का इस्तेमाल विदेशी एजेंसियां अपनी खुफिया निगरानी के लिए कर सकती हैं.

भारतीय सर्वर की अनिवार्य शर्त (Elon Musk Starlink Satellite Internet)

भारत सरकार ने स्टारलिंक पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि नियम तय किए हैं कि स्टारलिंक को भारत में सर्विस देने के लिए स्थानीय गेटवे स्थापित करने होंगे और डेटा ट्रैफिक भारतीय सर्वर के जरिए गुजारना होगा ताकि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा मानकों की जांच हो सके.

चीन, रूस और उत्तर कोरिया में बैन (Elon Musk Starlink Ban In World)

अंतरराष्ट्रीय शिपिंग में कार्यरत अधिकारियों के अनुसार, समंदर में जहाजों के लिए स्टारलिंक भले ही तेज इंटरनेट देता हो, लेकिन दुनिया के कई संप्रभु देश अपनी समुद्री सीमा में घुसते ही जहाजों को स्टारलिंक बंद करने का सख्त आदेश देते हैं. चीन, रूस, उत्तर कोरिया, ईरान, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों में स्टारलिंक पूरी तरह प्रतिबंधित है.

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चीन के बंदरगाहों पर जब कोई विदेशी मालवाहक जहाज पहुंचता है, तो वहां के अधिकारी मौके पर जाकर जांच करते हैं कि स्टारलिंक उपकरण की पावर केबल निकली हुई है या नहीं. यदि डिवाइस बंद होने के बावजूद केबल जुड़ी पाई जाती है, तो जहाज पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता है.

क्या भारत को स्टारलिंक की जरूरत? (Does India Need Starlink Elon Musk)

व्यावहारिक नजरिए से देखें तो भारत का घरेलू डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर आज दुनिया के सबसे आधुनिक और किफायती नेटवर्क्स में गिना जाता है. भारत में 4G और 5G डेटा की दरें दुनिया में सबसे सस्ती हैं, जबकि स्टारलिंक के हार्डवेयर और मासिक सब्सक्रिप्शन की लागत आम नागरिक के बजट से काफी बाहर है.

राहुल गौर मानते हैं कि भारत खुद अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी है. आने वाले समय में इसरो (ISRO) और भारतीय दूरसंचार कंपनियां स्वदेशी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं.



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