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‘600 फीट गहरे बोरवेल से भी पानी की एक बूंद नहीं’ महाराष्ट्र के नंदुरबार में सूखे से उजड़ रहे किसानों के खेत

Nandurbar Drought Crisis: महाराष्ट्र का नंदुरबार इलाका भयंकर सूखे से गुजर रहा है. फसलों को बचाने के लिए विनोद जाधव पाटिल ने एक-दो नहीं, बल्कि चार बोरवेल खोदे. हर बोरवेल करीब 600 फीट गहरा होने के बावजूद, उन्हें पानी की एक बूंद भी नहीं मिली. पानी मिलने की उम्मीद में उन्होंने बोरवेल खोदने और पानी ढूंढने में करीब तीन लाख रुपये खर्च कर दिए.

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हाराष्ट्र के नंदुरबार में सूखे से उजड़ रहे किसानों के खेत (इमेज-Bharat Express)

Nandurbar Drought Crisis/विजय निकम: महाराष्ट्र का नंदुरबार इलाका भयंकर सूखे से गुजर रहा है. बारिश की कमी और ग्राउंडवाटर लेवल के नीचे जाने से शहादा तालुका में खेती पर पहले कभी नहीं हुआ ऐसा संकट आ गया है. किसानों की बड़ी मुश्किल से उगाई गई फसलें आंखों के सामने जल रही हैं, और फसलों को बचाने की कोशिशें भी नाकाम हो रही हैं. शहादा तालुका कोऑपरेटिव खरीद-बिक्री एसोसिएशन के डायरेक्टर और कवथल के किसान, श्री विनोद जाधव पाटिल को पानी की कमी के कारण आठ एकड़ गन्ने और छह एकड़ केले की फसल पर रोटावेटर चलाना पड़ा है. संकट यहीं खत्म नहीं हुआ, और डर है कि जल्द ही उनकी 12 एकड़ पपीते की फसल पर रोटावेटर चलाने की नौबत आ जाएगी.

चार बोरवेल खोदे, पर पानी की एक बूंद नहीं!

फसलों को बचाने के लिए विनोद जाधव पाटिल ने एक-दो नहीं, बल्कि चार बोरवेल खोदे. हर बोरवेल करीब 600 फीट गहरा होने के बावजूद, उन्हें पानी की एक बूंद भी नहीं मिली. पानी मिलने की उम्मीद में उन्होंने बोरवेल खोदने और पानी ढूंढने में करीब तीन लाख रुपये खर्च कर दिए. हालांकि, इतना खर्च करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी. एक तरफ फसलों पर लाखों रुपये खर्च और दूसरी तरफ, किसान दोहरी मुसीबत में फंस गया है.

पसीने से उगाई फसलें बेकार!

गन्ना, केला और पपीता जैसी फसलों को रेगुलर पानी की ज़रूरत होती है. लेकिन, बारिश के मुंह मोड़ने और ग्राउंडवॉटर सोर्स सूखने से फसलों को बचाना नामुमकिन होता जा रहा है. आठ एकड़ गन्ने और छह एकड़ केले पर रोटावेटर चलाने का मतलब न सिर्फ फसल का नुकसान है, बल्कि किसान की महीनों की मेहनत और फाइनेंशियल प्लानिंग भी बर्बाद हो रही है. अब 12 एकड़ पपीते की फसल का भविष्य भी अधर में लटक गया है.

कुल 26 एकड़ फसल खतरे में है; जिसमें से 14 एकड़ फसल पर रोटावेटर चलाना पड़ रहा है.

किसान मुश्किल में हैं, तो प्रशासन आखिर है कहां?

जब तालुका में किसानों के लिए ऐसा समय आता है, तो क्या प्रशासन सच में खेतों में जाकर हालात का मुआयना कर रहा है? क्या पानी की कमी वाले इलाकों का तुरंत सर्वे किया जा रहा है? प्रभावित किसानों की मदद के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? ऐसे सवाल अब उठ रहे हैं.

किसानों के मुताबिक, जैसे-जैसे पानी की कमी बढ़ रही है, संबंधित अधिकारियों के लिए ऑफिस से बाहर निकलना और सच में किसानों के बांधों पर जाकर हालात का मुआयना करना ज़रूरी है. सिर्फ डॉक्यूमेंट्स देखने और मीटिंग करने से किसानों की मुश्किल हल नहीं होगी. असली हालात को समझना और तुरंत कदम उठाना ज़रूरी है.

सर्वे करके तुरंत मदद की मांग

यह मांग बढ़ रही है कि शहादा तालुका के पानी की कमी से प्रभावित गांवों का सर्वे किया जाए और फसल के नुकसान का सर्वे किया जाए, ग्राउंडवाटर की स्थिति का रिव्यू किया जाए और सरकारी नियमों के अनुसार योग्य किसानों को तुरंत मदद दी जाए. साथ ही, पीने के पानी और खेती के पानी की समस्या को हल करने के लिए लंबे समय के उपाय किए जाने की ज़रूरत है.

आज विनोद जाधव पाटिल के खेत की तस्वीर सामने आई है, कल तालुका के और कितने किसानों को ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ेगा?

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किसानों की आंखों में पानी है, लेकिन खेतों में पानी नहीं है! लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी अगर फसलें नहीं बच रही हैं, तो किसान किससे गुहार लगाएं? अब प्रशासन सिर्फ वादे न करे, खेतों में जाकर स्थिति की गंभीरता को पहचाने और मदद के लिए तुरंत कदम उठाए, यही उम्मीद है!

-भारत एक्सप्रेस



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