कर्नाटक उच्च न्यायालय
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अदालत की कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की कॉपी को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुकदमों से जुड़े पक्षकारों को अदालत की कार्यवाही की पुरानी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की कॉपी मांगने का कोई अधिकार नहीं है. इसके लिए संबंधित अदालत का आदेश होना जरूरी है.
न्यायमूर्ति सी.एम. पूनाचा की पीठ ने दायर याचिका पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि ‘कर्नाटक लाइव स्ट्रीमिंग एंड रिकॉर्डिंग ऑफ कोर्ट प्रोसीडिंग्स अधिनियम 2021’ के नियम 8 और 10 किसी याचिकाकर्ता को अदालत की पुरानी रिकॉर्डिंग की कॉपी हासिल करने का अधिकार नहीं देते हैं, जब तक कि अदालत इसके लिए विशेष निर्देश न दे.
क्या था पूरा मामला?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी 72 वर्षीय ए. सत्यनारायण स्वामी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए की. याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट प्रशासन के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें अपील की सुनवाई से जुड़ी पुरानी रिकॉर्डिंग की कॉपी देने से इनकार कर दिया गया था. स्वामी ने वर्ष 2021 के नियम 8(3) के तहत रिकॉर्डिंग की कॉपी के लिए आवेदन किया था.
हालांकि, हाईकोर्ट प्रशासन ने नियम 10(1)(iii) का हवाला देते हुए उनका अनुरोध स्वीकार करने से इनकार कर दिया. प्रशासन का कहना था कि अदालत की कार्यवाही की पुरानी रिकॉर्डिंग तब तक आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं मानी जाएगी, जब तक संबंधित बेंच इसके लिए स्पष्ट निर्देश न दे.
याचिकाकर्ता की दलीलें और कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि नियम 8(3) में ऐसी रिकॉर्डिंग की कॉपी मांगने के लिए आवेदन करने का प्रावधान है, जो अदालत की वेबसाइट या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं है. उन्होंने रिकॉर्डिंग देने से इनकार करने के फैसले को संविधान के अनुच्छेद 14 के भी खिलाफ बताया, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है. इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने अदालत से नियम 8(3) के तहत आवेदनों पर फैसला लेने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने का निर्देश देने की मांग की थी.
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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन प्रावधानों से किसी आवेदक को पुरानी रिकॉर्डिंग की कॉपी पाने का ऐसा अधिकार नहीं मिलता, जिसे अदालत में लागू कराया जा सके. अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता के पास रिकॉर्डिंग की कॉपी हासिल करने का कानूनी अधिकार ही नहीं है, तो उसे खारिज करने के प्रशासनिक फैसले को चुनौती देने का सवाल ही नहीं उठता.
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