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चुनाव आयोग के कामकाज की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची जनहित याचिका

चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और EVM-VVPAT प्रक्रियाओं में सुधार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की गई है. इसमें रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने की मांग की गई है.

PIL Filed In Supreme Court Seeking Election Commission Transparency Reforms
Edited by Vaibhav Gupta

देश में निष्पक्ष चुनाव, मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता को और अधिक मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है. शीर्ष अदालत के वकील विशाल तिवारी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है. इस याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग के कामकाज, फैसलों की पारदर्शिता और प्रशासनिक सुधारों के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए, जो 6 महीने के भीतर अपनी सिफारिशें सौंपे.

फैसलों में असहमति दर्ज करने की पारदर्शी

याचिका में सितंबर 2026 की उन मीडिया रिपोर्टों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. इनमें चुनाव आयोग के भीतर दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा कुछ फैसलों पर अलग विचार या आपत्तियां दर्ज कराने की बात सामने आई थी. याचिकाकर्ता ने साफ किया है कि किसी भी संवैधानिक बहुसदस्यीय संस्था में मतभेद होना कोई गैरकानूनी बात नहीं है, लेकिन आयोग के भीतर होने वाली बैठकों, महत्वपूर्ण फैसलों और आयुक्तों की असहमति का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की एक पारदर्शी व्यवस्था जरूर होनी चाहिए. गोपनीयता और चुनावी सुरक्षा के नियमों का ध्यान रखते हुए इन जानकारियों को सार्वजनिक करने पर भी विचार किया जाना चाहिए.

EVM, VVPAT की समीक्षा की मांग

इस जनहित याचिका में सिर्फ फैसलों की ही नहीं, बल्कि आयोग के पूरे प्रशासनिक और तकनीकी ढांचे की समीक्षा करने की सिफारिश की गई है. याचिका में चुनाव आयोग के सचिवालय, कानूनी विशेषज्ञता, साइबर सुरक्षा, तकनीकी संसाधनों, अधिकारियों के तबादलों की नीति और वित्तीय व्यवस्था का आकलन कराने की मांग की गई है. इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) से जुड़ी प्रक्रियाओं में सुप्रीम कोर्ट के 26 अप्रैल 2024 के फैसले और मौजूदा नियमों का सख्ती से पालन कराने का आग्रह किया गया है.

याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रस्तावित विशेषज्ञ समिति केंद्र सरकार, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और शोधकर्ताओं से सुझाव लेकर 6 महीने में अपनी रिपोर्ट पेश करे और फिर सरकार व आयोग को तय समयसीमा में कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया जाए.

यह भी पढ़ें: कोर्ट की पुरानी रिकॉर्डिंग मांगने का कानूनी हक नहीं; कर्नाटक हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

-भारत एक्सप्रेस



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