3 नवंबर 1947 भारतीय सैन्य इतिहास का वह दिन है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. इसी दिन महज 24 साल की उम्र में भारतीय सेना के एक युवा अधिकारी ने अपनी बहादुरी और अदम्य साहस से इतिहास रच दिया था. उनका नाम मेजर सोमनाथ शर्मा था.
कश्मीर की धरती को दुश्मनों के कब्जे से बचाने के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन आखिरी सांस तक मैदान नहीं छोड़ा. आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश इस वीर सपूत को याद कर रहा है. उनकी कहानी सिर्फ एक सैनिक की बहादुरी की कहानी नहीं, बल्कि देश के प्रति समर्पण और कर्तव्य निभाने की ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी.
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के दाढ़ गांव में हुआ था. उनका परिवार पहले से ही सेना से जुड़ा हुआ था. उनके पिता मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा भारतीय सेना में वरिष्ठ पद पर कार्यरत थे. वहीं, उनके छोटे भाई विश्वनाथ शर्मा आगे चलकर भारतीय सेना के प्रमुख यानी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बने.
ऐसे माहौल में पले-बढ़े सोमनाथ के मन में बचपन से ही सेना में शामिल होकर देश की सेवा करने का सपना था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई नैनीताल के मशहूर शेरवुड कॉलेज से की. इसके बाद उन्होंने देहरादून स्थित प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया.
22 फरवरी 1942 को उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट की चौथी बटालियन में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन मिला. उस समय यह बटालियन 19वीं हैदराबाद रेजिमेंट के नाम से जानी जाती थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने बर्मा के अराकान क्षेत्र में जापानी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला. यहां दिखाई गई उनकी बहादुरी के लिए उनका नाम ‘मेंशन इन डिस्पैचेज’ में शामिल किया गया था.
जब कश्मीर पर मंडराने लगा था खतरा
1947 में देश आजाद हुआ ही था कि जम्मू-कश्मीर पर संकट के बादल मंडराने लगे. पाकिस्तान की ओर से कबायली हमलावरों ने कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी. हालात तेजी से बिगड़ रहे थे. महाराजा हरि सिंह के भारत में विलय के फैसले के बाद भारतीय सेना को कश्मीर की रक्षा के लिए भेजा गया.
उस समय श्रीनगर हवाई अड्डे की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती थी. यह हवाई अड्डा भारतीय सेना के लिए बेहद अहम था, क्योंकि इसी रास्ते सैनिकों और जरूरी सैन्य मदद को घाटी तक पहुंचाया जा सकता था. अगर दुश्मन इस पर कब्जा कर लेते, तो पूरे कश्मीर पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता था.
ऐसे मुश्किल समय में मेजर सोमनाथ शर्मा को बड़गाम इलाके में मोर्चा संभालने की जिम्मेदारी दी गई.
हाथ टूटा था, फिर भी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हुए
3 नवंबर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा अपनी डेल्टा कंपनी के करीब 90 से 100 जवानों के साथ बड़गाम पहुंचे. खास बात यह थी कि उस समय उनके बाएं हाथ में फ्रैक्चर था और प्लास्टर चढ़ा हुआ था. इसके बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे अधिकारी को सौंपने से इनकार कर दिया.
कुछ ही देर में भारतीय सैनिकों को चारों तरफ से घिरने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा. सामने करीब 500 से 700 कबायली हमलावर थे. दुश्मनों की संख्या भारतीय जवानों के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी और वे तीन दिशाओं से हमला कर रहे थे.
हालात बेहद कठिन थे, लेकिन मेजर शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी. वे खुद मोर्चे पर डटे रहे और अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे. गोलियों की बारिश के बीच वे सैनिकों को गोला-बारूद पहुंचाने, उनकी मदद करने और हवाई हमलों के लिए दुश्मनों की स्थिति बताने वाले पैनल लगाने में जुटे रहे.
इसी दौरान उन्होंने ब्रिगेड मुख्यालय को एक संदेश भेजा, जो आज भी भारतीय सेना के इतिहास में साहस और दृढ़ संकल्प की मिसाल माना जाता है.
उन्होंने कहा था,
“दुश्मन हमसे केवल 50 गज की दूरी पर हैं. हम संख्या में बहुत कम हैं. हम पर भयंकर गोलाबारी हो रही है. मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगा और अंतिम व्यक्ति तथा अंतिम गोली तक लड़ता रहूंगा.”
आखिरी सांस तक निभाया अपना फर्ज
बड़गाम में लड़ाई लगातार तेज होती जा रही थी. मेजर शर्मा और उनके जवान पूरी ताकत से दुश्मनों का मुकाबला कर रहे थे. इसी बीच एक मोर्टार का गोला उनके पास रखे गोला-बारूद के नजदीक आकर गिरा. हुए जोरदार विस्फोट में मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हो गए.
हालांकि, उनके शहीद होने के बाद भी भारतीय जवानों ने हार नहीं मानी. उनकी बहादुरी और नेतृत्व से प्रेरित होकर सैनिक लगातार लड़ते रहे. इस संघर्ष में भारतीय कंपनी ने करीब छह घंटे तक दुश्मनों को आगे बढ़ने से रोके रखा.
यह देरी भारतीय सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई. इस दौरान श्रीनगर हवाई अड्डे की सुरक्षा मजबूत करने और अतिरिक्त सैनिकों को वहां पहुंचाने का जरूरी समय मिल गया. इस तरह मेजर शर्मा और उनके साथियों के संघर्ष ने कश्मीर को बचाने में अहम भूमिका निभाई.
स्वतंत्र भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता बने
मेजर सोमनाथ शर्मा की वीरता और सर्वोच्च बलिदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. यह भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है. वह इस सम्मान को पाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले सैनिक बने.
इस सम्मान से जुड़ी एक दिलचस्प बात भी है. परमवीर चक्र का डिजाइन सावित्री खानोलकर ने तैयार किया था. वह मेजर सोमनाथ शर्मा के भाई की सास थीं.
आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा है उनकी कहानी
मेजर सोमनाथ शर्मा का बलिदान सिर्फ एक सैन्य घटना नहीं है. यह उस जिम्मेदारी, हिम्मत और देशप्रेम की याद दिलाता है, जिसके लिए भारतीय सैनिक हर परिस्थिति में तैयार रहते हैं. बड़गाम की लड़ाई में उनके साथ खड़े जवानों ने भी अद्भुत साहस दिखाया और देश की सुरक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया.
आज जब हम कश्मीर के इतिहास को देखते हैं, तो बड़गाम की उस लड़ाई और उसमें शहीद हुए सैनिकों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मेजर सोमनाथ शर्मा ने अपने जीवन से यह साबित किया कि सच्चा नेतृत्व सिर्फ आदेश देने में नहीं, बल्कि मुश्किल वक्त में सबसे आगे खड़े रहने में होता है.
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