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पहाड़ों का चलता-फिरता खजाना है यह बकरी, कड़ाके की ठंड में भी किसानों को कर रही मालामाल

हिमालयी इलाकों में पाए जाने वाली चिगू बकरी कम संसाधनों के बीच भी पशुपालकों के लिए वरदान साबित हो रही है. यह बकरी कश्मीरी ऊन और मांस उत्पादन के लिए उपयोगी है और कम चारे में भी बेहतरीन उत्पादन देती है.

पहाड़ों की ऊंचाइयों पर कड़ाके की ठंड और कम सुविधाओं के बीच गुजारा करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन हिमालयी इलाकों में एक ऐसी खास नस्ल पाई जाती है जो इन मुश्किल हालातों में भी पशुपालकों के लिए वरदान साबित हो रही है. हम बात कर रहे हैं ‘चिगू बकरी’ की.

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पशुपालन और डेयरी विभाग ने इस शानदार नस्ल की खूबियों का जिक्र किया है, जिसके बाद से यह चर्चा का विषय बनी हुई है.

कहां पाई जाती है चिगू?

चिगू बकरी मुख्य रूप से उत्तरकाशी (उत्तराखंड) और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिलती है. ये इलाके अपनी हाड़ कंपा देने वाली ठंड के लिए जाने जाते हैं. कुदरत ने इस बकरी को कुछ इस तरह ढाला है कि यह शून्य से नीचे के तापमान में भी बड़े मजे से रह लेती है. जहां अन्य मवेशियों के लिए ऊंचे इलाकों में सर्वाइव करना मुश्किल होता है, वहीं चिगू वहां की आबोहवा में रची-बसी है.

पशुपालकों के लिए चिगू बकरी पालना किसी ‘डबल जैकपॉट’ से कम नहीं है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका उपयोग दो प्रमुख कामों के लिए किया जाता है:

  • कश्मीरी ऊन (Pashmina): चिगू के शरीर पर जो बारीक बाल होते हैं, उनसे उच्च गुणवत्ता वाली कश्मीरी ऊन तैयार की जाती है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस ऊन की भारी मांग रहती है, जिससे स्थानीय किसानों को मोटी कमाई होती है.
  • मांस उत्पादन: ऊन के अलावा, इस बकरी का मांस भी काफी पसंद किया जाता है. औसतन एक स्वस्थ चिगू बकरी का वजन 40 किलोग्राम तक होता है, जो इसे मांस उत्पादन के लिहाज से भी एक मुनाफे का सौदा बनाता है.

आज के समय में जब पशुओं के चारे की कीमतें आसमान छू रही हैं, चिगू बकरी अपनी एक अनोखी खूबी के कारण किसानों की पहली पसंद बनी हुई है. यह बकरी बहुत कम चारे में भी बेहतरीन उत्पादन देने की क्षमता रखती है. पहाड़ों की ढलानों पर मिलने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों को खाकर ही यह अपना गुजारा कर लेती है, जिससे पशुपालकों को बाहर से महंगे दाने या चारे पर ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता.

पहाड़ों की पहचान है चिगू

चिगू बकरी सिर्फ आय का जरिया मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्वतीय जीवन और पशुपालन संस्कृति का एक हिस्सा है. पीढ़ी दर पीढ़ी पहाड़ी समुदाय के लोग इस नस्ल को पालते आ रहे हैं. यह बकरी वहां की आजीविका को तो संभालती ही है, साथ ही हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में भी अपनी खास जगह रखती है.

अगर आप भी पहाड़ी क्षेत्रों में पशुपालन के जरिए स्वरोजगार की राह देख रहे हैं, तो चिगू बकरी निश्चित रूप से एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है. यह कम मेहनत और सीमित संसाधनों में भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का दम रखती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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