तुर्कमेनिस्तान के काराकुम रेगिस्तान में 55 सालों से जलता 'दरवाजा गैस क्रेटर'.(AI IMAGE)
Door to Hell Turkmenistan: सोचिए… एक ऐसा विशालकाय गड्ढा, जो न किसी उल्कापिंड के गिरने से बना और न ही यह प्रकृति की कोई देन है, बल्कि यह इंसान की एक छोटी सी गणितीय गलती का वो भयानक नतीजा है जो पिछले 55 सालों से लगातार जल रहा है! रेगिस्तान की बेजान रेत के बीचोबीच धधकती यह आग कोई कुदरती करिश्मा नहीं, बल्कि इंसानी लापरवाही का वो ‘नरक जैसा मंजर’ है जिसे बुझाने के सारे इंसानी पैंतरे पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं.
साल 1971 में सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा प्राकृतिक गैस की ड्रिलिंग के दौरान यह ज़मीन ढह गई थी. जहरीली मीथेन गैस के फैलाव को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें आग लगाई थी, यह सोचकर कि गैस कुछ दिनों में खत्म हो जाएगी. हालांकि, असीमित मीथेन भंडार के कारण यह आग आज तक नहीं बुझ सकी और अब यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आकर्षण बन चुका है.
55 सालों से रेगिस्तान में भड़क रही रहस्यमयी आग
तुर्कमेनिस्तान की राजधानी अश्गाबात से लगभग 260 किलोमीटर दूर काराकुम रेगिस्तान के विशाल रेतीले मैदानों के बीच एक ऐसा भयानक और अद्भुत दृश्य दिखाई देता है, जिसे दुनिया ‘नरक का दरवाजा’ (Door to Hell) के नाम से जानती है. इस इलाके में 229 फीट चौड़ा और 70 फीट गहरा एक विशाल गड्ढा मौजूद है, जो पिछले 55 सालों से बिना रुके धू-धू कर जल रहा है. स्थानीय लोग इसे ‘दरवाजा गैस क्रेटर’ कहते हैं, जबकि तुर्कमेनिस्तान सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर ‘शाइनिंग ऑफ काराकुम’ नाम दिया है.
हादसा जो बन गया 55 साल की पहेली
इस भयानक आग की शुरुआत साल 1971 में हुई थी, जब यह इलाका सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था. सोवियत वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम यहां प्राकृतिक गैस के भंडार की तलाश में ड्रिलिंग कर रही थी. ड्रिलिंग के दौरान अचानक जमीन ढह गई और एक बड़ा गड्ढा बन गया. जमीन के नीचे दबे विषैले मीथेन गैस के रिसाव को रोकने और आसपास के गांवों को खतरे से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें आग लगाने का फैसला किया.
उनका अनुमान था कि गैस का भंडार कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगा और आग स्वतः बुझ जाएगी. लेकिन उनका यह अंदाजा पूरी तरह से गलत साबित हुआ, क्योंकि यह गड्ढा अमु-दरिया बेसिन के ऊपर स्थित था, जहां प्राकृतिक गैस का अंतहीन भंडार मौजूद है.
पर्यटन का केंद्र और विज्ञान की खोज
समय के साथ यह मानवनिर्मित दुर्घटना दुनिया भर के लोगों के लिए एक बड़े आकर्षण का केंद्र बन गई. रात के अंधेरे में इस गड्ढे की लपटें और नारंगी चमक कई किलोमीटर दूर से दिखाई देती हैं. हालांकि तुर्कमेनिस्तान सरकार ने इस गड्ढे को बंद करने और आग बुझाने के कई प्रयास किए, लेकिन मीथेन का निरंतर प्रवाह होने के कारण हर योजना नाकाम रही.
वैज्ञानिकों के लिए भी यह स्थान बेहद रहस्यमयी रहा है, कनाडा के शोधकर्ता जॉर्ज कोउरोनिस विशेष हीट-प्रूफ सूट पहनकर इस धधकते गड्ढे के तल तक उतरे थे ताकि यहां की मिट्टी के नमूनों में चरम वातावरण में जीवित रहने वाले बैक्टीरिया की खोज की जा सके. आज यह ‘नरक का दरवाजा’ न केवल एक वैज्ञानिक पहेली है, बल्कि देश के पर्यटन और अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा भी बन चुका है.
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-भारत एक्सप्रेस
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