Birsa Munda's Death Anniversary
Birsa Munda’s Death Anniversary: जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला देने वाले महान क्रांतिकारी भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है. 9 जून 1900 को रांची की जेल में मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अंतिम सांस ली थी, लेकिन उनका ‘उलगुलान’ आज भी करोड़ों दिलों में जिंदा है.
ब्रिटिश सरकार के ‘इंडियन फॉरेस्ट एक्ट’ और जमींदारों के शोषण के खिलाफ आदिवासियों को एकजुट करने वाले भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है. उनके नेतृत्व में चले ‘उलगुलान’ आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया था. 500 रुपये के इनाम के लालच में अपनों के धोखे के कारण वे गिरफ्तार हुए और रांची जेल में अंग्रेजों द्वारा दिए गए धीमे जहर के कारण मात्र 25 साल की उम्र में शहीद हो गए.
आदिवासियों के ‘भगवान’, जिन्हें अंग्रेजों ने जहर दे दिया
जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का संघर्ष सदियों पुराना है और आज भी जारी है. ऐसे ही एक महान विद्रोह के जनक बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है. 9 जून 1900 को रांची की जेल में मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने अंतिम सांस ली. अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर देकर शहीद कर दिया, लेकिन बिरसा मुंडा आदिवासियों के दिलों में ‘धरती बाबा’ और ‘भगवान’ के रूप में अमर हो गए.
जमींदारी, सूदखोरी और जंगलों पर कब्जा
ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों की नजर भारत के घने जंगलों पर हमेशा से रही. आदिवासी समुदाय इन जंगलों को अपनी जननी मानते थे और उनके संरक्षण में अपनी संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व देखते थे. लेकिन अंग्रेजों ने ‘इंडियन फॉरेस्ट एक्ट’ जैसे कानूनों के जरिए जंगलों पर कब्जा कर लिया. आदिवासी कबीलों के पारंपरिक सरदारों को ‘महाजन’ का दर्जा देकर लगान की नई व्यवस्था थोप दी गई.
नतीजा यह हुआ कि आदिवासी कर्ज के जाल में फंस गए. सूदखोर महाजनों ने कर्ज के बदले उनकी जमीनें हड़प लीं. खेती-बाड़ी के पारंपरिक तरीकों पर पाबंदियां लगा दी गईं. आदिवासी धीरे-धीरे अपनी जमीन, जंगल और गरिमा सब खोते जा रहे थे. इसी असंतोष और दमन के माहौल में बिरसा मुंडा का उदय हुआ.
‘धरती बाबा’ का उदय
1895 में बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों की जमींदारी व्यवस्था और सूदखोर महाजनों के खिलाफ खुली बगावत का बिगुल बजा दिया. वे मुंडा समुदाय से थे और जल्द ही पूरे आदिवासी इलाकों में लोकप्रिय हो गए. लोगों ने उन्हें ‘धरती बाबा’ कहना शुरू कर दिया. बिरसा ने आदिवासियों को एकजुट किया, उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया और दमनकारी ताकतों के खिलाफ संघर्ष का आह्वान किया.
उनके नेतृत्व में आदिवासी समुदाय ने न केवल अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ी, बल्कि अपनी आस्था, रीति-रिवाज और स्वाभिमान की रक्षा भी की.
उलगुलान – महान विद्रोह
बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चला यह विद्रोह उलगुलान (महान विद्रोह) के नाम से इतिहास में दर्ज है.
- अगस्त 1897 : बिरसा ने करीब 400 आदिवासियों के साथ एक थाने पर हमला किया.
- जनवरी 1900 : रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई निर्णायक लड़ाई. हजारों आदिवासी तीर-कमान लेकर अंग्रेजों की तोपों और बंदूकों के सामने डटे रहे.
यद्यपि अंग्रेजों की बेहतर हथियारों के आगे आदिवासियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन यह विद्रोह ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया. अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा के सिर पर 500 रुपये का इनाम रखा — उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम.
गिरफ्तारी और शहादत
कहा जाता है कि बिरसा की ही पहचान वाले कुछ लोगों ने 500 रुपये के लालच में उनकी छिपने की जगह पुलिस को बता दी. चक्रधरपुर से गिरफ्तार कर बिरसा को रांची जेल भेज दिया गया. जेल में उन्हें धीमा जहर दिया गया. 9 जून 1900 को वे शहीद हो गए.
उनकी मृत्यु के बावजूद उलगुलान आंदोलन ने आदिवासी चेतना को नई ऊर्जा दी. यह विद्रोह सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं, बल्कि स्वाभिमान, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की लड़ाई था.
बिरसा मुंडा की विरासत
आज भी झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में बिरसा मुंडा आदिवासियों के प्रेरणास्रोत बने हुए हैं. उनके नाम पर विश्वविद्यालय, मूर्तियां, पार्क और सरकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं. लेकिन सबसे बड़ी विरासत वह संघर्ष है जो जल-जंगल-जमीन के अधिकार के लिए आज भी जारी है.
बिरसा मुंडा ने साबित कर दिया कि उम्र छोटी हो या हथियार कमजोर, अगर उद्देश्य सच्चा हो और इच्छाशक्ति अटूट हो तो साम्राज्यों को भी चुनौती दी जा सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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