End of LTTE: आज से ठीक 17 साल पहले 18 मई के दिन श्रीलंका ने दशकों पुराने आतंकवाद के काले अध्याय को समाप्त किया था. यह कहानी है दुनिया के सबसे खूंखार संगठन LTTE के उत्थान और उसके विनाशकारी अंत की.
1976 में प्रभाकरन द्वारा स्थापित LTTE ने श्रीलंका में अलग ‘तमिल ईलम’ (Tamil Eelam) की मांग को लेकर 26 वर्षों तक खूनी संघर्ष छेड़ा, जिसमें सुसाइड बॉम्बिंग और बच्चों को लड़ाकू बनाने जैसी क्रूरता शामिल थी. 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर इस संगठन ने भारत को गहरा जख्म दिया.
18 मई 2009 को श्रीलंकाई सेना के ‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान मुल्लैतिवू में प्रभाकरन की मौत के साथ इस खूंखार आतंकी साम्राज्य का पूरी तरह खात्मा हो गया, जिससे दशकों से चले आ रहे गृहयुद्ध पर विराम लगा.
आतंक का उदय और विस्तार
लीबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) की नींव 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने रखी थी. इस संगठन का मुख्य उद्देश्य श्रीलंका के उत्तर-पूर्व में तमिल अल्पसंख्यकों के लिए एक अलग राष्ट्र ‘तमिल ईलम’ का निर्माण करना था. देखते ही देखते यह संगठन महज एक विद्रोही गुट से बदलकर दुनिया का सबसे घातक आतंकी ढांचा बन गया.
इनके पास अपनी नौसेना (सी टाइगर्स) थी और इन्होंने ही दुनिया को ‘सुसाइड बेल्ट’ (Suicide belt) और आत्मघाती हमलों की भयावह तकनीक से परिचित कराया. बच्चों को लड़ाकू (Child Soldiers) बनाना इनकी सबसे क्रूर प्रथाओं में से एक थी.
भारत पर गहरा घाव: राजीव गांधी हत्याकांड
भारत और LTTE के बीच का संघर्ष 1987 में तब शुरू हुआ जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शांति स्थापना के लिए भारतीय शांति सेना (IPKF) को श्रीलंका भेजा. LTTE ने इसे अपने अस्तित्व पर खतरा माना और बदले की आग में 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक आत्मघाती हमले के जरिए राजीव गांधी की हत्या कर दी.
इस घटना ने भारत को हिलाकर रख दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर LTTE की छवि एक बेहद खतरनाक संगठन के रूप में स्थापित हो गई.
2009 का ‘ऑपरेशन विजय’
श्रीलंका सरकार ने साल 2009 में आतंकवाद के खिलाफ ‘आर-पार’ की लड़ाई का मन बनाया. राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के नेतृत्व में श्रीलंकाई सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ (Operation Vijay) शुरू किया. सेना ने धीरे-धीरे LTTE के गढ़ किलिनोच्ची और मुल्लैतिवू को अपने कब्जे में लेना शुरू किया. जैसे-जैसे घेरा छोटा हुआ, प्रभाकरन और उसके बचे हुए लड़ाके एक छोटे से तटीय इलाके में सिमट गए.
भयंकर गोलाबारी और सैन्य कार्रवाई के बीच LTTE का सैन्य ढांचा पूरी तरह चरमरा गया.
प्रभाकरन का अंत
18 मई 2009 को वह ऐतिहासिक पल आया जब श्रीलंकाई सेना को प्रभाकरन का शव मिला. इसके साथ ही 26 सालों से चला आ रहा खूनी गृहयुद्ध आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया. हालांकि, इस अंतिम युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन और हजारों नागरिकों की मौत पर वैश्विक स्तर पर सवाल भी उठे, लेकिन श्रीलंका के लिए यह आतंकवाद से मुक्ति का नया सवेरा था.
यह जीत साबित करती है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से सबसे बड़े आतंकी नेटवर्क को भी ध्वस्त किया जा सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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