भारत की आज़ादी का इतिहास जब भी सामने आता है, तो कुछ बड़े पुरुष नेताओं और क्रांतिकारियों के नाम सबसे पहले याद आते हैं. लेकिन इस लंबे संघर्ष की कहानी सिर्फ पुरुषों तक सीमित नहीं थी. देश की अनगिनत महिलाओं ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा संभाला, जेल गईं, गोलियां खाईं और जरूरत पड़ने पर हथियार तक उठाए.
इनमें से कई महिलाओं के नाम इतिहास की मुख्यधारा में उतने चर्चित नहीं हो पाए, जितने होने चाहिए थे. किसी ने छोटी उम्र में आंदोलन का नेतृत्व किया तो किसी ने अपने परिवार और सामाजिक बंदिशों से आगे बढ़कर देश के लिए संघर्ष किया. आइए जानते हैं ऐसी ही सात साहसी महिलाओं के बारे में, जिनकी कहानियां आज भी हिम्मत और देशभक्ति की मिसाल हैं.
झलकारी बाई: रानी लक्ष्मीबाई की भरोसेमंद साथी
1857 के विद्रोह के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहने वाली झलकारी बाई का नाम खास तौर पर याद किया जाता है. वह रानी की बेहद विश्वसनीय सहयोगियों में शामिल थीं.
जब अंग्रेजी सेना ने झांसी को घेर लिया, तब झलकारी बाई ने ऐसा साहसिक कदम उठाया, जिसने रानी को सुरक्षित निकलने का मौका दिया. उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का रूप धारण कर अंग्रेज सैनिकों को भ्रमित किया और खुद मोर्चे पर डट गईं. उनकी बहादुरी और बलिदान की कहानी आज भी 1857 के संघर्ष की अहम यादों में शामिल है.
मातंगिनी हाजरा: उम्र नहीं बनी हिम्मत की राह में बाधा
पश्चिम बंगाल की मातंगिनी हाजरा को लोग प्यार से ‘गांधी बुड़ी’ के नाम से जानते थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब देश में अंग्रेजों के खिलाफ माहौल तेज हो रहा था, तब उन्होंने उम्र की परवाह किए बिना आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.
बताया जाता है कि 72-73 वर्ष की उम्र में उन्होंने हजारों स्वयंसेवकों के जुलूस का नेतृत्व किया. उनका लक्ष्य तमलुक थाने पर तिरंगा फहराना था. पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए गोलियां चलाईं, लेकिन मातंगिनी हाजरा पीछे नहीं हटीं. हाथ में तिरंगा लिए वह ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाती आगे बढ़ती रहीं और आखिरकार शहीद हो गईं.
कनकलता बरुआ: 17 साल की उम्र में शहादत
असम की कनकलता बरुआ की कहानी बताती है कि आज़ादी की लड़ाई में उम्र कभी बाधा नहीं बनी. वह महज 17 साल की थीं, जब उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया.
गोहपुर थाने पर तिरंगा फहराने के लिए निकले जुलूस का उन्होंने नेतृत्व किया. ब्रिटिश पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की और गोलीबारी में कनकलता बरुआ शहीद हो गईं. इतनी कम उम्र में देश के लिए दिया गया उनका बलिदान आज भी असम के लोगों के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है.
तारा रानी श्रीवास्तव: पति की शहादत के बाद भी नहीं रुकीं
बिहार की तारा रानी श्रीवास्तव ने भी भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. वह अपने पति फुलेन्दु बाबू के साथ आंदोलन में सक्रिय थीं.
सीवान थाने के पास प्रदर्शन के दौरान दोनों तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़े. इसी दौरान पुलिस की गोली से फुलेन्दु बाबू घायल हुए और शहीद हो गए. लेकिन तारा रानी ने अपना हौसला नहीं खोया. उन्होंने आंदोलन जारी रखा और अकेले ही आगे बढ़ती रहीं. निजी दुख के बीच भी देश के आंदोलन से पीछे न हटने का उनका फैसला उनकी असाधारण दृढ़ता को दिखाता है.
कैप्टन लक्ष्मी: डॉक्टर से बनीं आजाद हिंद फौज की कमांडर
डॉ. लक्ष्मी सहगल की कहानी स्वतंत्रता आंदोलन के एक अलग अध्याय को सामने लाती है. पेशे से डॉक्टर लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज से जुड़ीं और महिलाओं की लड़ाकू टुकड़ी ‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट’ की कमान संभाली.
यह महिलाओं की ऐसी सैन्य टुकड़ी थी, जिसने उस दौर की सामाजिक सोच को भी चुनौती दी. लक्ष्मी सहगल ने बर्मा मोर्चे पर चिकित्सा सेवाओं के साथ-साथ आजाद हिंद फौज की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई. आज़ादी के बाद भी उनका जीवन सामाजिक सेवा और राजनीति से जुड़ा रहा.
प्रीतिलता वड्डेदार: 21 साल की उम्र में क्रांतिकारी बलिदान
बंगाल की प्रीतिलता वड्डेदार उन युवा क्रांतिकारियों में थीं, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुना. 1932 में उन्होंने पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर हुए सशस्त्र हमले का नेतृत्व किया.
हमले के बाद अंग्रेजों के हाथों पकड़े जाने की आशंका थी. संगठन और साथियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने साइनाइड खाकर अपनी जान दे दी. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 21 साल थी. उनका साहस और बलिदान बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन की सबसे चर्चित कहानियों में गिना जाता है.
रानी गाइदिनल्यू: किशोर उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह
पूर्वोत्तर भारत की रानी गाइदिनल्यू ने बेहद कम उम्र में ब्रिटिश शासन को चुनौती देना शुरू कर दिया था. वह महज 13 वर्ष की थीं, जब हैपौ जादोनांग के आंदोलन से जुड़ीं. इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना और अपने लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना था.
कर न देने और स्वशासन की मांग को लेकर ब्रिटिश सरकार ने उन पर कड़ी कार्रवाई की. गाइदिनल्यू को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा और उन्होंने करीब 14 वर्ष कारावास में बिताए. बाद में जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘रानी’ की उपाधि दी. पूर्वोत्तर भारत में उनका नाम आज भी स्वतंत्रता संघर्ष और जनजातीय अस्मिता की एक मजबूत आवाज के रूप में लिया जाता है.
इन वीरांगनाओं की कहानी क्यों याद रखनी चाहिए?
इन सात महिलाओं की राह एक जैसी नहीं थी. किसी ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए, किसी ने शांतिपूर्ण जुलूस का नेतृत्व किया, तो किसी ने सैन्य संगठन की कमान संभाली. किसी ने छोटी उम्र में बलिदान दिया और किसी ने बुढ़ापे में भी अंग्रेजी शासन के सामने झुकने से इनकार कर दिया.
इनकी कहानियां यह याद दिलाती हैं कि भारत की आज़ादी का संघर्ष समाज के हर वर्ग और हर हिस्से की भागीदारी से आगे बढ़ा था. महिलाओं ने सिर्फ आंदोलन में हिस्सा ही नहीं लिया, बल्कि कई मौकों पर नेतृत्व भी किया और अपने साहस से पूरे समाज को रास्ता दिखाया.
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-भारत एक्सप्रेस
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