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जल बिना कैसा होगा कल? ‘बहे सो गंगा’ में पत्रकार मंजीत ठाकुर ने दी उत्तर भारत को बड़ी चेतावनी

Bahe So Ganga Book Review: मंजीत ठाकुर की पुस्तक ‘बहे सो गंगा’ उत्तर भारत में बढ़ते जल संकट और नदियों के क्षरण पर केंद्रित है. पुस्तक गंगा, यमुना समेत कई नदियों की बिगड़ती स्थिति, प्रदूषण और अतिक्रमण के खतरों को उजागर करती है.

Bahe So Ganga Book Review: मंजीत ठाकुर की पुस्तक “बहे सो गंगा” (प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन) जल संकट, नदियों के क्षरण और विशेष रूप से उत्तर भारत में गंगा तथा अन्य नदियों की दयनीय स्थिति पर एक गहन और चिंताजनक दस्तावेज है. यह पुस्तक मात्र एक रिपोर्ट या आलोचना नहीं, बल्कि शोध, सर्वेक्षणों, सरकारी-गैरसरकारी रिपोर्टों और निजी अध्ययनों पर आधारित एक सशक्त चेतावनी है. लेखक का मुख्य प्रश्न है: *क्या नदियां मर जाएंगी?*

पुस्तक का सार और विषयवस्तु

पुस्तक “डार्क जोन में बदलता उत्तर भारत” उपशीर्षक के साथ गंगा की धारा को प्रतीक बनाकर उत्तर भारत के पर्यावरणीय, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को रेखांकित करती है. मंजीत ठाकुर, जो पेशे से पत्रकार हैं और झारखंड के मधुपुर में जन्मे मिथिला के मूल निवासी हैं, अपनी पुस्तक में नदियों के सूखने, उनका रास्ता बदलने, प्रदूषण और अतिक्रमण की समस्या को विस्तार से उठाते हैं.

पुस्तक के कुछ प्रमुख बिंदु:

  • छोटी नदियों का विलुप्त होना: गुवाहाटी की भरलु-बहिनी, वाराणसी की वरुणा-असि, पुणे की मूला-मूथा, कोलकाता की आदिगंगा जैसी नदियाँ नालों में बदल चुकी हैं. शहरीकरण और अतिक्रमण ने इनकी चौड़ाई सिकोड़ दी है.
  • यमुना और अन्य उदाहरण: दिल्ली की यमुना, लुधियाना का बूढ़ा नाला, मुंबई की मीठी नदी – ये सब पहले स्वच्छ जल स्रोत थे, अब गंदे नाले बन चुके हैं.
  • गंगा का संकट: ‘नमामि गंगे’ जैसे कार्यक्रमों के बावजूद नीतिगत कमी, मीडियोकर विशेषज्ञता और इंजीनियरिंग-केंद्रित सोच की आलोचना. फरक्का बैराज जैसी परियोजनाओं के दुष्परिणामों का जिक्र.
  • जल संकट की चेतावनी: बढ़ती आबादी, अनियंत्रित विकास और नदियों को कूड़ेदान समझने की सामूहिक लापरवाही से भयावह भविष्य की ओर इशारा.

लेखक सवाल उठाते हैं कि नदियों को देवी मानने वाले समाज ने उन्हें कैसे पाटना और सुखाना शुरू कर दिया? लोकगीतों, परंपराओं और इतिहास से जुड़ी नदियां आज विकास की बलि चढ़ रही हैं.

यह पुस्तक पर्यावरणविदों, नीति-निर्माताओं, छात्रों और आम पाठकों के लिए अनिवार्य है. यह केवल समस्याओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि हमें सोचने पर मजबूर करती है. हमारी सभ्यता नदियों पर टिकी है, और अगर हमने इन्हें बचाया नहीं तो आने वाली पीढ़ियां जल संकट की मार झेलेंगी. पुस्तक हमें याद दिलाती है कि “जल बिना कैसा होगा कल?”

“बहे सो गंगा”एक बहती नदी की तरह पाठक को अपनी धारा में खींच लेती है और अंत में गहरी चिंता व जागरूकता छोड़ जाती है. मंजीत ठाकुर की यह कृति उत्तर भारत के बदलते परिदृश्य को समझने का एक मजबूत माध्यम है.यदि आप पर्यावरण, जल-संरक्षण या गंगा से जुड़े मुद्दों में रुचि रखते हैं, तो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें. यह न केवल जानकारी देती है, बल्कि कार्रवाई का आह्वान भी करती है.

गंगा बहती रहे, इसके लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे. “बहे सो गंगा” इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

-भारत एक्सप्रेस



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