Maithili Sharan Gupt Jayanti: आज हिंदी साहित्य के एक महान स्तंभ, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती है. 1886 में झांसी के निकट चिरगाँव में जन्मे गुप्त जी ने खड़ी बोली को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया और राष्ट्रीय चेतना को साहित्य के माध्यम से जागृत किया. महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि दी. उनकी रचनाओं में ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, ‘पंचवटी’ और ‘जयद्रथ वध’ प्रमुख हैं, लेकिन जिस कृति ने उन्हें जन-जन का कवि बना दिया, वह है ‘भारत-भारती’.
सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज
1912-13 में रचित और 1914 में प्रकाशित यह खंडकाव्य स्वदेश-प्रेम, अतीत के गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य की आकांक्षा का अनूठा संगम है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार यह हिंदी प्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली पुस्तक थी. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे युगांतरकारी बताया. रामधारी सिंह दिनकर ने इसे “भारतीय साहित्य में सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज” कहा है- जो पुस्तक के कवर पर भी अंकित है.
यह काव्य तीन खंडों में विभाजित है:
अतीत खंड
भारतवर्ष के गौरवशाली इतिहास, समृद्ध सभ्यता, संस्कृति, कला-कौशल, दर्शन, धर्म और वीर पुरुषों के आदर्शों का गुणगान. इसमें अतिशयोक्ति से बचते हुए प्रमाणों के साथ भारत की प्राचीन उन्नति को चित्रित किया गया है.
वर्तमान खंड
ब्रिटिश शासनकाल की दुर्दशा, सामाजिक कुरीतियां, दारिद्र्य, नैतिक पतन, आपसी भेदभाव और औपनिवेशिक शोषण का मार्मिक चित्रण. कवि समाज की निष्क्रियता और सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हैं.
भविष्यत् खंड
भारतीयों को जागरूक होने, उद्योग, उत्साह और एकता से उज्ज्वल भविष्य गढ़ने के लिए आह्वान. यह खंड आशा और प्रेरणा से भरा है.
प्रसिद्ध पंक्तियां जैसे “हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी” आज भी गूंजती हैं. प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आंदोलनों, स्कूलों और प्रातःकालीन प्रार्थनाओं में इसके पद गाए जाते थे. यह मौलाना हाली के ‘मुसद्दस’ की परंपरा में लिखा गया है और बाद के कवियों—माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान आदि—के लिए प्रेरणा स्रोत बना.
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गुप्त जी ने प्रस्तावना में लिखा था कि भारत की पूर्व और वर्तमान दशा में भारी अंतर है. कविता उत्साह जगाने का साधन है. आज भी जब हम आत्मगौरव, सांस्कृतिक जड़ों और भविष्य निर्माण की बात करते हैं, तब ‘भारत-भारती’ प्रासंगिक बनी रहती है. यह केवल इतिहास या देशभक्ति का पाठ नहीं, बल्कि आत्म-विश्लेषण और जागरण का माध्यम है.
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती पर पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित यह संस्करण हमें याद दिलाता है कि साहित्य समय से ऊपर होता है. ‘भारत-भारती’ पढ़ना न केवल साहित्यिक आनंद है, बल्कि अपने देश की आत्मा को समझने का एक सुंदर तरीका भी है.
-भारत एक्सप्रेस
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