आज विश्व रंगमंच दिवस मनाया जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान (ITI) द्वारा 1961 में शुरू किया गया यह दिवस रंगमंच की शक्ति को सलाम करता है- वो शक्ति जो समाज को आईना दिखाती है, सत्ता से सवाल करती है और शांति-सांस्कृतिक एकता का संदेश देती है. भारत में रंगमंच का अपना गौरवशाली इतिहास है, जो स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल तक सत्ता के टकराव में रचा-बसा है. ठीक इसी संदर्भ में राजकमल प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित ‘मंच प्रवेश: अलकाजी/पद्मसी परिवार की यादें’ एक ऐसा दस्तावेज है जो विश्व रंगमंच दिवस पर विशेष चर्चा का विषय बनता है.
ये पुस्तक फैसल अलकाजी की लिखी हुई है और अमितेश कुमार ने इसका सुंदर अनुवाद किया है. यह किताब 256 पृष्ठों की है और इसमें पचास से ज्यादा दुर्लभ तस्वीरें शामिल हैं. राजकमल प्रकाशन की वेबसाइट पर इसे ‘भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान’ कहा गया है, जिसे पहले कभी इस तरह नहीं लिखा गया. रंगप्रेमी इसे संजोकर रखना चाहेंगे और अच्छी कहानी पसंद करने वाले पाठक भी.
अलकाजी-पद्मसी परिवार की विरासत
फैसल अलकाजी इब्राहिम अलकाजी (भारतीय रंगमंच के महान गुरु और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के संस्थापक निदेशक) के बेटे हैं. उनकी जीवन-संगिनी पद्मसी परिवार से ताल्लुक रखती थीं, जो रंगमंच की प्रस्तुतियों में वेश-भूषा की मुख्य डिजाइनर रहीं. पुस्तक इन दोनों परिवारों की यादों पर आधारित है. यह कोई साधारण संस्मरण नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय रंगमंच का संक्षिप्त इतिहास है- एक ‘इनसाइडर’ की नजर से. फैसल अलकाजी उन अफसानों को जोड़ते हैं जो केवल मंच के अंदरूनी व्यक्ति ही जान सकता है.
पुस्तक को पढ़ते हुए लगता है कि रंगमंच सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जीवित आलोचना है. लेखक सत्ता और मंच के टकराव को बार-बार उजागर करते हैं. आपातकाल के दौरान पुलिस द्वारा नाटकों को रोकना, कलाकारों को थाने बुलाना, हथकड़ी और आदेशात्मक भाषा- ये सब प्रसंग दिखाते हैं कि सत्ता को प्रतीकों और कल्पनाओं से कितना डर लगता है. एम.एस. जौहर के नाटक ‘भूटोटो’ का उदाहरण खासतौर पर मारक है, जहां कला को केवल मनोरंजन मानने की बजाय सवाल पूछने पर उसे संदिग्ध और खतरनाक घोषित कर दिया जाता है.
सत्ता से टकराव और स्त्री-प्रतिरोध की कहानियां
पुस्तक में रंगमंच को ‘लोकतंत्र की परीक्षा’ की तरह देखा गया है. आपातकाल में सांस्कृतिक स्वतंत्रता कुचली गई, लेकिन जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद भी दमनकारी संरचनाएं नहीं बदलीं. लेखक लिखते हैं कि हम उन लोगों में से नहीं थे जो बिना लड़े हथियार रख दें. राजीव गांधी युग में सेंसरशिप और भी परिष्कृत हो गई- नैतिकता और शालीनता के नाम पर असहमति को सीमित किया गया. स्त्री-उत्पीड़न के मुद्दे, हिरासत में हिंसा, बलात्कार और राज्य-समाज के नियंत्रण को पुस्तक में विशेष जगह दी गई है. रंगमंच यहां न्यायालय की बजाय नैतिक विवेक की भूमिका निभाता है.
समकालीन संदर्भ में भी पुस्तक बेहद प्रासंगिक है. सोशल मीडिया, ट्रोल संस्कृति और राष्ट्रवाद के नए औजार दमन के पुराने रूपों को बदलकर पेश करते हैं, लेकिन सत्ता की आत्मा वही रहती है. समीक्षक इसे ‘भारतीय लोकतंत्र की आलोचनात्मक कथा’ कहते हैं, जो रंगमंच को जोखिमपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखती है.
क्यों पढ़ें ‘मंच प्रवेश’?
ये पुस्तक रंगमंच के इतिहास को पहले कभी इस तरह दर्ज नहीं किया गया था. यह सिर्फ अलकाजी परिवार की कहानी नहीं, बल्कि पूरे भारतीय रंगमंच की साहसिक यात्रा है, जहां कलाकार सत्ता से टकराते हैं, जनता की भाषा (ग्रामीण बोलचाल, गालियां, देह-संकेत) को बिना छंटनी के मंच पर लाते हैं और लोकतंत्र को सजीव रखते हैं.
विश्व रंगमंच दिवस 2026 पर यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि रंगमंच कभी भी सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा. ये असहमति का मंच है, सवालों का हथियार है और बदलाव का माध्यम है. राजकमल प्रकाशन ने साहित्य और रंगमंच के प्रेमियों को एक अनमोल उपहार दिया है.
अगर आप रंगमंच प्रेमी हैं, इतिहास के शौकीन हैं या लोकतंत्र की जड़ों को समझना चाहते हैं, तो ‘मंच प्रवेश’ जरूर पढ़ें.
मंच प्रवेश- राजकमल प्रकाशन
लेखक: फैसल अलकाजी
अनुवाद: अमितेश कुमार
मूल्य: ₹450 (वर्तमान में छूट पर उपलब्ध)
रंगमंच जिंदा है, क्योंकि सवाल जिंदा हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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