इतिहास के पन्नों से बाहर आईं ‘पादशाह बेगम’: राजीव कुमार के उपन्यास में जीवंत हुई जहांआरा की शक्ति और संवेदना
राजीव कुमार का उपन्यास 'जहांआरा: पादशाह बेगम' मुगल शहजादी जहांआरा के त्याग, विद्वत्ता और राजनीतिक कौशल की कहानी है। यह किताब चांदनी चौक की वास्तुकार और सूफी मत की अनुयायी जहांआरा के व्यक्तित्व को एक नए नारीवादी दृष्टिकोण से पेश करती है.
सीबीआई अधिकारी की सजा: संस्थागत भ्रष्टाचार पर सवाल!
दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के फैसले में CBI के एक वरिष्ठ अधिकारी को दोषी ठहराए जाने के बाद एजेंसी की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं. अदालत ने ‘मालाफाइड’ कार्रवाई को गैर-कानूनी माना. अब अनुच्छेद 311 और सीसीएस (सीसीए) नियम 19 के तहत विभागीय कार्रवाई की मांग तेज हो गई है.
मोबाइल के शोर के बीच किताबों में सुकून तलाशता मन, पढ़िए.. सुधा और चंदर के बदलते रूप की दास्तां
Gunahon Ka Devta LITERATURE BLOG: स्मार्टफोन के युग में किताबों से जुड़कर कैसा रहा 'गुनाहों का देवता' और 'मुसाफिर कैफ़े' तक का सफर? पढ़िए प्रेम और बदलते रिश्तों पर मेरा विशेष अनुभव.
व्यंजन नहीं, संस्कृति का आईना: ‘इतिहास की थाली’ के बहाने समझें अपनी जीवंत विरासत को सहेजने की जरूरत
अनिमेष मुखर्जी की नई पुस्तक 'इतिहास की थाली' भोजन के माध्यम से भारत के सदियों पुराने इतिहास, व्यापार और सांस्कृतिक बदलावों को परत-दर-परत खोलती है. चाय के वैश्विक सफर से लेकर आलू-टमाटर के 'विदेशी' होने तक, ये किताब हमारी थाली का हर निवाला सत्ता, राजनीति और उपनिवेशवाद की गवाही देता है.
नोएडा में मजदूर अशांति: क्या एक राष्ट्रीय चेतावनी?
नोएडा में मजदूरों का हिंसक प्रदर्शन सिर्फ स्थानीय घटना नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है. न्यूनतम मजदूरी में अंतर, महंगाई और संवाद की कमी ने आग भड़काई.
कैसे सुधरे भारतीय पुलिस स्टेशनों की दयनीय स्थिति?
देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन अभी भी पुरानी इमारतों में हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं जैसे वाहन, फोन, शौचालय और डिजिटल सिस्टम तक की भारी कमी है. 2025 के आंकड़ों के अनुसार 58 स्टेशनों में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और कई में मालखाना गंदा व असुरक्षित है, जिससे जांच में देरी और सबूत खराब हो रहे हैं...
8 अप्रैल 1974: जब पटना की सड़कों पर उतरी थी ‘मौन क्रांति’: जेपी की जीवनी में कैद है लोकतंत्र की आजादी की गाथा
8 अप्रैल 1974 का दिन भारतीय राजनीति में अहिंसक संकल्प का प्रतीक है. सुप्रसिद्ध इतिहासकार बिमल प्रसाद और सुजाता प्रसाद की पुस्तक 'क्रांति का सपना' (वाणी प्रकाशन) जेपी के उस मौन जुलूस की याद दिलाती है.
ऊर्जा की नई उड़ान: क्या ‘शांति विधेयक 2025’ बनेगा भारत के सुनहरे भविष्य का आधार? परमाणु शक्ति में अब प्राइवेट सेक्टर की होगी एंट्री
भारत सरकार ने 'शांति विधेयक 2025' पारित कर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निजी भागीदारी को हरी झंडी दे दी है. इंदौर में पीतल के पन्नों पर उकेरे गए इस ऐतिहासिक कानून के क्या हैं प्रावधान और ये देश के भविष्य को कैसे बदलेगा.
विवेक अग्निहोत्री की ‘रक्तबोध’ ने हिलाया बंगाल का इतिहास; विभाजन के खूनी पन्नों की दास्तां, जिन्हें किताबों से मिटा दिया गया
क्या बंगाल का इतिहास केवल 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' तक सीमित है? विवेक रंजन अग्निहोत्री की नई किताब 'रक्तबोध' उन कड़वे सत्यों को सामने लाती है, जिन्हें दशकों तक सेक्युलर राजनीति और औपनिवेशिक इतिहासकारों ने दबाए रखा.
80 लाख का पैकेज, अमेरिका का अनुभव… फिर भी ‘AI छंटनी’ का खौफ; दो इंजीनियरों की गई जान का जिम्मेदार कौन?
बेंगलुरु में आईटी सेक्टर से जुड़े एक दंपति ने नौकरी असुरक्षा और तनाव के चलते आत्महत्या कर ली. AI के कारण बढ़ती छंटनी और मानसिक दबाव ने युवाओं के बीच गंभीर चिंता पैदा कर दी है...







