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श्रीलाल शुक्ल की जन्म शताब्दी: राग दरबारी का अमर स्वर

श्रीलाल शुक्ल की जन्म शताब्दी पर उनकी कालजयी कृति राग दरबारी एक बार फिर हमें स्वतंत्र भारत के ग्रामीण जीवन, सत्ता, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन का आईना दिखाती है.

आज (बुधवार) को हिंदी साहित्य के उस महान हस्ताक्षर की जन्म शताब्दी है, जिन्होंने अपनी कलम से स्वतंत्र भारत के ग्रामीण परिवेश की नब्ज को इतनी बखूबी पकड़ा कि उनकी रचनाएं आज भी हमारी सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों का आईना बनकर खड़ी हैं. श्रीलाल शुक्ल, जिनका जन्म 1925 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के अतरौली गांव में हुआ था, एक सिविल सेवक से विद्रोही लेखक बने. उनकी कालजयी कृति राग दरबारी (1968) न केवल हिंदी उपन्यास की दुनिया में एक मील का पत्थर है, बल्कि भारतीय व्यंग्य साहित्य की अनमोल धरोहर भी.

नौकरशाही से साहित्य तक

श्रीलाल शुक्ल का जन्म एक साधारण ग्रामीण परिवार में हुआ. 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक होने के बाद वे 1949 में उत्तर प्रदेश राज्य सिविल सेवा में शामिल हुए और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में पहुंचे. 1983 में सेवानिवृत्ति तक उन्होंने नौकरशाही के अंदरूनी चरित्र को करीब से देखा, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट झलकता है. वे हिंदी, अवधी, उर्दू, अंग्रेजी और संस्कृत के विद्वान थे, साथ ही शास्त्रीय संगीत के रसिक. लेखन उनका विधिवत जुनून 1954 से शुरू हुआ, लेकिन उनकी कलम हमेशा सामाजिक यथार्थ की खोज में लगी रही. उन्होंने 25 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें उपन्यास, व्यंग्य संग्रह, कहानी संग्रह, संस्मरण और आलोचना शामिल हैं. उनकी अन्य प्रमुख रचनाएं हैं – सूनी घाटी का सूरज (1957), मकान (1976), पहला पड़ाव (1987) और विश्रामपुर का संत (1998). व्यंग्य संग्रह जैसे अंगद का पांव (1958) और जहालत के पचास साल (2003) में उन्होंने आधुनिक भारत की विडंबनाओं को चुटकी लेते हुए उकेरा.

शुक्ल जी का जीवन संघर्षों से भरा था. पार्किंसन जैसी बीमारी और निजी जीवन की त्रासदियां (जिनमें उनकी पत्नी गिरिजा देवी का निधन भी शामिल है) ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि उनकी लेखनी को और तीखा बनाया. वे 28 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में चल बसे, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है.

राग दरबारी: व्यंग्य का शिखर, यथार्थ का आईना

श्रीलाल शुक्ल की साहित्यिक पहचान राग दरबारी से ही जुड़ जाती है. यह उपन्यास 1968 में प्रकाशित हुआ और तुरंत ही हिंदी साहित्य की एक अमर कृति बन गया. कथानक काल्पनिक गांव शिवपालगंज (या कैलाशपुर) पर केंद्रित है, जहां सूखा पड़ने के बावजूद सामंती जमींदार राजा साहब महल बनाने में जुटे हैं, जबकि भूखे किसान बेमौत मर रहे हैं. नायक रंगनाथ, एक नौजवान बुद्धिजीवी, गांव लौटता है और यहां की भ्रष्टाचार, पाखंड और सत्ता के खेलों का चश्मदीद गवाह बनता है. पात्र जैसे स्कूल प्रिंसिपल छंगामल, मास्टर मोतीराम (जो पढ़ाने के बजाय धंधों में व्यस्त हैं) और अन्य ग्रामीण चरित्र समाज की नंगी सच्चाइयों को उजागर करते हैं.

उपन्यास की विषयवस्तु गहरी है – स्वतंत्र भारत के ग्रामीण जीवन में नैतिक पतन, शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा, राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामंती शोषण. शुक्ल जी ने व्यंग्य की तलवार से इन विसंगतियों को काटा है, लेकिन बिना कड़वाहट के. जैसे, एक दृश्य में छात्रों को सैनिटरी फिटिंग की जानकारी न होने पर शिक्षा का मजाक उड़ाया गया है. यह मोहभंग के दौर की त्रासदी है, जहाँ आदर्शवाद हार जाता है और यथार्थ की कड़वी हंसी बाकी रह जाती है. राग दरबारी का अनुवाद 15 भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी में हो चुका है, और 1980 के दशक में इसका दूरदर्शन धारावाहिक भी प्रसारित हुआ.

इसकी प्रासंगिकता आज भी बरकरार है. आज के भारत में, जहां ग्रामीण विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है, यह उपन्यास एक चेतावनी की तरह लगता है. एक हालिया लेख में कहा गया है कि शुक्ल जी की कलम ने “भारत के वास्तविक ग्रामीण जीवन को जीवंत कर दिया.”

पुरस्कारों से सजा साहित्यिक सफर

श्रीलाल शुक्ल की प्रतिभा को कई सम्मानों से नवाजा गया. राग दरबारी के लिए 1969 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. 1999 में विश्रामपुर का संत के लिए व्यास सम्मान, 2008 में पद्म भूषण और 2009 में ज्ञानपीठ पुरस्कार – जो हिंदी साहित्य का सर्वोच्च सम्मान है. अन्य पुरस्कारों में लोहिया सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और यश भारती शामिल हैं. ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें अस्पताल के बेड पर ही प्रदान किया गया, जो उनके जीवन की विडंबना को दर्शाता है.

एक सतत प्रासंगिकता

राग दरबारी जैसी कृतियां साबित करती हैं कि सच्चा व्यंग्य कालातीत होता है – यह हंसाता है, रुलाता है और सोचने पर मजबूर करता है. आज, जब हम 2025 में उनके शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहे हैं, तो याद रखें: शुक्ल जी की कलम ने न केवल ग्रामीण भारत की कहानी कही, बल्कि हमें अपना चेहरा दिखाया. उनकी स्मृति में राग दरबारी को दोबारा पढ़ें, और सोचें क्या कुछ बदला है?

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-भारत एक्सप्रेस



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