Adani securities case: अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) ने संघीय अदालत को बताया है कि अडानी ग्रुप चेयरमैन गौतम अडानी के खिलाफ दर्ज आपराधिक सिक्योरिटीज केस को कभी आगे बढ़ाना ही नहीं चाहिए था. विभाग का कहना है कि यह दरअसल असफल रहे FCPA (Foreign Corrupt Practices Act) आरोपों को सिक्योरिटीज फ्रॉड के रूप में दोबारा पेश करने की कोशिश थी.
भारत से जुड़ा मामला
4 जुलाई को दाखिल याचिका में डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर ट्रेंट मैककॉटेर ने कहा कि पूरा मामला भारत से जुड़ा है. इसमें भारतीय नागरिक, भारतीय कंपनी, भारतीय सरकारी अधिकारी और भारतीय कॉन्ट्रैक्ट शामिल हैं. अमेरिका से इसका बहुत सीमित संबंध है.
कानूनी जोखिम और कमजोरियां
DoJ ने कहा कि केस में कई कानूनी जोखिम थे क्योंकि सिक्योरिटीज अमेरिका से बाहर बेचे गए थे और कथित गलत बयान भी विदेश में दिए गए थे. विभाग ने यह भी तर्क दिया कि अभियोजकों ने बिना साबित हुए आरोपों को सिक्योरिटीज फ्रॉड में बदलने की कोशिश की, जबकि अदालतें आमतौर पर ऐसे मामलों को ‘कॉर्पोरेट पफरी’ यानी गैर-गंभीर बयान मानती हैं.
निवेशकों पर भरोसा मुश्किल
विभाग ने यह भी कहा कि निवेशक बड़े संस्थान थे, इसलिए यह साबित करना कठिन था कि उन्होंने कथित गलत बयानों पर भरोसा किया.
सिविल केस ज्यादा उचित
मैककॉटेर ने बताया कि अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों की स्वतंत्र समीक्षा के बाद तय किया गया कि यह मामला आपराधिक नहीं बल्कि सिविल स्तर पर निपटाया जाना चाहिए.
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मीडिया रिपोर्टों को खारिज
DoJ ने उन खबरों को भी गलत बताया जिनमें कहा गया था कि केस की वापसी का कारण अमेरिका में अडानी से जुड़े निवेश हैं. विभाग ने कहा कि असली वजह कानूनी रिकॉर्ड है, जिसमें अधिकार क्षेत्र की समस्या, निवेशकों का नुकसान न होना, सबूतों की कमी और भारत में समानांतर जांच शामिल हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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