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क्लासरूम के बाहर: कैसे देवबंद सम्मेलन में अल्पसंख्यक संस्थाएं गढ़ रही हैं भारत का भविष्य

देवबंद के इस्लामिया डिग्री कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन ‘विकसित भारत @2047’ ने अल्पसंख्यक संस्थानों की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित किया है. डॉ. इंद्रेश कुमार और एनसीएमईआई के प्रो. शाहिद अख्तर जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक संस्थान केवल संस्कृति के संरक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के गतिशील इंजन हैं

Deoband Conference 2026
Edited by Vaibhav Gupta

देवबंद/सहारनपुर: एक ऐसे राष्ट्र में, जिसे अक्सर सामाजिक विभाजन की दृष्टि से देखा जाता है, इस सप्ताह ऐतिहासिक शहर देवबंद से एक शक्तिशाली प्रतिनिधित्व उभरकर सामने आया. स्थान था इस्लामिया डिग्री कॉलेज, और मौका था एक राष्ट्रीय सम्मेलन का, जिसने भारत में अल्पसंख्यक शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही नए सिरे से परिभाषित किया. भारत सरकार के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान आयोग (एनसीएमईआई) और कॉलेज द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस सम्मेलन का विषय था, “राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्र-निर्माण में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों की भूमिका: विकसित भारत @2047”. यह सम्मेलन कानूनी चर्चा से आगे बढ़कर सामूहिक राष्ट्रीय जिम्मेदारी का आह्वान बन गया.

शिक्षाविदों, प्रशासकों और समुदाय के नेताओं की इस सभा ने एक मूलभूत प्रश्न को विश्लेषित किया: 2047 तक विकसित भारत की ओर अग्रसर दिशा में, क्या अल्पसंख्यक संस्थान केवल संरक्षित द्वीप हैं, या फिर राष्ट्रीय प्रगति के गतिशील इंजन? सर्वसम्मति स्पष्ट रूप से बाद वाले पक्ष के पक्ष में झुकी.

भावी पीढ़ियों के लिए भारत की सह-अस्तित्व की विरासत

संवाद की वैचारिक आधारशिला मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार ने रखी. इतिहास के प्रतिबिंब और भविष्योन्मुखी दृष्टि को मिलाते हुए दिए गए अपने भाषण में कुमार ने एक स्पष्ट विरोधाभास को प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा, “जबकि दुनिया के कई हिस्से घृणा और संघर्ष की आग में जल रहे हैं, भारत की पहचान टकराव पर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सह-अस्तित्व की संस्कृति पर बनी है.” उन्होंने शिक्षकों से एकता की शिक्षा को जानबूझकर चुनने का आग्रह किया. “हमें अगली पीढ़ी को क्रोध नहीं, बल्कि साथ रहने के मूल्य सिखाने चाहिए… विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत है.”

उनका संदेश सीधे तौर पर पहचान की चिंताओं को संबोधित करता था: “अल्पसंख्यक होना न कोई अपराध है, न ही हीनता का चिह्न. आप बाहरी नहीं हैं—आप भारतीय थे, आप भारतीय हैं, और आप सदा भारतीय रहेंगे.” यह भावना सम्मेलन के मूल विषय की प्रतिध्वनि थी: ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ के लेबल से ऊपर उठकर “राष्ट्र के प्रथम नागरिक” होने की मूलभूत पहचान को अपनाना.

संवैधानिक अधिकार और अल्पसंख्यक संस्थान

इस मिशन के लिए संवैधानिक ढांचे को एनसीएमईआई के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर ने विस्तार से समझाया. उन्होंने स्पष्ट किया कि छह अधिसूचित समुदायों, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी को अनुच्छेद 30 के तहत अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र की बहुलवादी संरचना की रक्षा के लिए बनी एक संवैधानिक गारंटी है. उन्होंने कहा, “आयोग के पास अल्पसंख्यक दर्जा देने की एक पारदर्शी प्रक्रिया है,” यह बताते हुए कि अब तक देश भर में 14,000 से अधिक संस्थानों को यह दर्जा दिया जा चुका है, जिनमें केवल सहारनपुर जिले के 104 संस्थान शामिल हैं.

हालांकि, प्रो. अख्तर तुरंत जिम्मेदारी की ओर मुड़े. उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा, “आज का उद्देश्य केवल अधिकारों पर चर्चा करना नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित करना है.” उन्होंने इन संस्थानों की भूमिका को शैक्षणिक सीमाओं से आगे बढ़ाया, उन्हें “राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक सद्भाव और डिजिटल व एआई-संचालित युग के लिए सक्षम नागरिक तैयार करने में एक महत्वपूर्ण कड़ी” बताया.

इस उन्नत भूमिका के आह्वान को जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा ने और मजबूती दी, जिन्होंने तर्क दिया कि अल्पसंख्यक संस्थानों को सक्रिय रूप से “संरक्षित स्थानों” से विकसित होकर “शैक्षणिक उत्कृष्टता और राष्ट्रीय विकास के केंद्र” बनना चाहिए.

भविष्य की ज्ञान अर्थव्यवस्था के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

इस परिवर्तन का मार्ग समकालीन नीति और आर्थिक दृष्टि से जोड़ा गया. एमएसयू सहारनपुर की कुलपति प्रो. विमला यादव ने समावेशी और समग्र शिक्षा को बढ़ावा देने में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की संरेखित करने वाली भूमिका पर जोर दिया. इससे पहले, सुमित राजेश महाजन ने शिक्षा, ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और कौशल विकास के बीच के संबंध को रेखांकित किया, और भारत की युवा जनसांख्यिकी को राष्ट्र की प्रमुख संपत्ति बताया.

सम्मेलन का समापन अंतिमता की भावना के साथ नहीं, बल्कि कार्रवाई की गति के साथ हुआ. सामूहिक संकल्प यह था कि इसे एक अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक पहल के रूप में देखा जाए. इसने एक ऐसे विजन का समर्थन किया, जहां अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान भाषा और संस्कृति को गर्व से संरक्षित करते हुए, उन विशिष्ट धागों को एक मजबूत राष्ट्रीय ताने-बाने में बुनते हैं. ऐसा करके, देवबंद संवाद ने इन संस्थानों को 2047 की ओर भारत की यात्रा में हाशिए पर नहीं, बल्कि ठीक केंद्र में विरासत के संरक्षक और एक एकीकृत, विकसित भविष्य के वास्तुकार के रूप में स्थापित किया.

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-भारत एक्सप्रेस



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