शिक्षकों के लिए एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है. जरा सोचिए, अगर भगवान न करे किसी को कोई ऐसी बीमारी हो जाए जिसका इलाज लंबा चले, और उस दौरान दफ्तर या स्कूल जाने की टेंशन न हो? इतना ही नहीं, छुट्टी के दौरान आपकी पूरी सैलरी आपके खाते में आती रहे और आपकी सीनियरिटी या पेंशन पर भी कोई आंच न आए. हालांकि ये किसी सपने जैसा लग सकता है, लेकिन गोवा सरकार ने अपने स्कूल शिक्षकों के लिए इसे हकीकत बना दिया है.
गोवा सरकार ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए ‘स्पेशल मेडिकल लीव पॉलिसी’ को मंजूरी दी है. इस नई नीति के तहत, लाइलाज या गंभीर बीमारियों से जूझ रहे शिक्षक अब पूरे एक साल (365 दिन) की पेड लीव ले सकेंगे.
क्या है गोवा सरकार का बड़ा फैसला?
गोवा के शिक्षा निदेशालय ने मंगलवार, 10 फरवरी 2026 को इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी किया. शिक्षा निदेशक शैलेश झेंडे द्वारा जारी इस आदेश के मुताबिक, यह सुविधा राज्य के सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के नियमित (Regular) शिक्षकों को मिलेगी.
सबसे अच्छी बात यह है कि इस लंबी छुट्टी का शिक्षक के करियर पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा. जब शिक्षक इलाज कराकर वापस स्कूल लौटेंगे, तो उनकी वरिष्ठता (Seniority) बरकरार रहेगी, प्रमोशन के रास्ते खुले रहेंगे और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली पेंशन में भी एक पैसे की कटौती नहीं होगी.
किन बीमारियों में मिलेगी राहत?
यह छुट्टी हर छोटी-मोटी बीमारी के लिए नहीं है, बल्कि यह उन ‘टर्मिनल इलनेस’ (Terminal Illness) के लिए है जहां मरीज को लंबे और गहन उपचार की जरूरत होती है. गोवा सरकार ने इसके लिए बीमारियों की एक लिस्ट तय की है:
- एडवांस्ड स्टेज का कैंसर
- किडनी, लिवर या हार्ट फेलियर (एंड स्टेज)
- ALS (एक गंभीर नसों की बीमारी)
- न्यूरो-डिजेनेरेटिव डिसॉर्डर (जैसे पार्किंसंस या भूलने की गंभीर बीमारी)
अगर किसी शिक्षक को एक साल बाद भी आराम नहीं मिलता, तो मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर इस छुट्टी को आगे भी बढ़ाया जा सकता है. इसके लिए बस गोवा मेडिकल कॉलेज का सर्टिफिकेट जरूरी होगा.
क्या देशभर में होनी चाहिए ऐसी पॉलिसी?
गोवा जैसे छोटे राज्य की इस पहल ने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है. अक्सर देखा जाता है कि सरकारी कर्मचारी गंभीर बीमारी की स्थिति में भी छुट्टी लेने से कतराते हैं, क्योंकि उन्हें सैलरी कटने या करियर पीछे छूट जाने का डर सताता है.
वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि गोवा का यह मॉडल पूरे भारत के लिए एक ‘बेंचमार्क’ बन सकता है. हालांकि, इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि देश में करोड़ों सरकारी कर्मचारी हैं. इसके लिए पुख्ता फंड और कड़े मेडिकल वेरिफिकेशन की जरूरत होगी ताकि नियम का गलत इस्तेमाल न हो.
-भारत एक्सप्रेस
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