Kader Khan Death Anniversary: 31 दिसंबर, साल का आखिरी दिन. एक तरफ लोग नए साल की पार्टी, जश्न और नई उम्मीदों की तैयारियों में डूबे हैं, तो वहीं हिंदी सिनेमा को चाहने वालों के लिए यह तारीख हर बार एक गहरी उदासी भी साथ लेकर आती है. आज ही के दिन, साल 2018 में, फिल्म इंडस्ट्री ने कादर खान जैसे बेमिसाल कलाकार को खो दिया था. एक ऐसा नाम, जिसकी कमी आज भी हर दौर की फिल्मों में महसूस की जाती है.
जब किरदारों से ज्यादा भारी हुआ करते थे डायलॉग
कादर खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे. वे उस दौर की पहचान थे, जब फिल्मों में डायलॉग किरदार से भी ज्यादा ताकतवर होते थे. उनकी आवाज में वजन था, शब्दों में असर था और अदायगी में एक अलग ही सच्चाई झलकती थी. यही वजह है कि सालों बाद भी उनके बोले हुए संवाद लोगों की ज़ुबान पर जिंदा हैं.
संघर्षों से भरा बचपन, लेकिन हौसले अडिग
1937 में अफगानिस्तान के काबुल में जन्मे कादर खान की जिंदगी आसान नहीं रही. बचपन से ही उन्होंने गरीबी और तंगी का सामना किया. बंटवारे के बाद परिवार के साथ मुंबई आए, जहां रहने के लिए कमाठीपुरा जैसी जगह मिली. हालात ऐसे थे कि कई बार खाली पेट रात गुजारनी पड़ती थी. लेकिन मुश्किलों के बीच भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी. पढ़ाई को उन्होंने अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया.
उनकी मेहनत रंग लाई और वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर प्रोफेसर बने. कॉलेज में पढ़ाते हुए भी उनका झुकाव थिएटर और नाटकों की ओर बना रहा. मंच पर अभिनय करना उनके लिए सिर्फ शौक नहीं था, बल्कि वही जगह बनी, जिसने आगे चलकर उन्हें सिनेमा तक पहुंचाया.
थिएटर से फिल्मों तक का सफर
कहते हैं सच्ची प्रतिभा देर-सवेर अपनी जगह बना ही लेती है. एक नाटक के दौरान दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार की नजर कादर खान पर पड़ी. उनकी अदायगी और संवाद बोलने के अंदाज से प्रभावित होकर दिलीप कुमार ने उन्हें फिल्मों में आने का मौका दिया. यहीं से कादर खान का फिल्मी सफर शुरू हुआ, जो दशकों तक चलता रहा.
डायलॉग्स के पीछे का दिमाग
70 और 80 का दशक हिंदी सिनेमा का गोल्डन पीरियड माना जाता है. इस दौर में अमिताभ बच्चन के दमदार डायलॉग्स ने सिनेमाघरों में तालियां और सीटियां बटोरीं. लेकिन इन शब्दों के पीछे जो कलम चलती थी, वह कादर खान की थी. ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘अमर अकबर एंथोनी’ और ‘कुली’ जैसी फिल्मों के डायलॉग आज भी उतने ही असरदार लगते हैं.
कादर खान की खासियत यह थी कि वे आम आदमी की भाषा को भी बड़े पर्दे पर शान के साथ पेश करते थे. उनके डायलॉग न तो बनावटी लगते थे, न भारी-भरकम, बल्कि सीधे दिल में उतर जाते थे.
गंभीरता छोड़ कॉमेडी को अपनाया
90 के दशक में कादर खान ने खुद को एक नए रूप में पेश किया. उन्होंने कॉमेडी को सिर्फ हंसी का जरिया नहीं बनाया, बल्कि उसे एक पहचान दी. गोविंदा और शक्ति कपूर के साथ उनकी तिकड़ी ने दर्शकों को खूब हंसाया. ‘साजन चले ससुराल’ और ‘दूल्हे राजा’ जैसी फिल्मों में उनका कॉमिक अंदाज आज भी लोगों को हंसने पर मजबूर कर देता है.
एक कलाकार नहीं, एक दौर
करीब 300 फिल्मों में अभिनय और लगभग 250 फिल्मों के संवाद लिखने वाले कादर खान सिर्फ एक कलाकार नहीं थे, वे अपने आप में एक पूरा स्कूल थे. विलेन बनकर डराना हो, पिता बनकर रुलाना हो या कॉमेडियन बनकर ठहाके लगवाने हों, उन्होंने हर किरदार को यादगार बना दिया.
आज जब फिल्मों में संवादों की धार कमजोर पड़ती दिखती है, तब कादर खान की कमी और भी ज्यादा खलती है. साल का आखिरी दिन आते ही उनका जाना फिर याद आता है और यह एहसास गहरा हो जाता है कि कुछ खाली जगहें कभी भरी नहीं जा सकतीं. कादर खान भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा की रूह में वे हमेशा जिंदा रहेंगे.
-भारत एक्सप्रेस
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