Real Dhurandhar Major Mohit Sharma: साल 2004 में जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर एक सुरक्षित ठिकाने पर बैठकर भारतीय सेना पर हमले की योजना बना रहे थे. उन सब के बीच एक शख्स बैठा था, जिसका नाम ‘इफ्तिखार भट्ट’ था. ‘इफ्तिखार भट्ट’ कोई आतंकी नहीं, बल्कि वे भारतीय सेना की एलीट ‘1 पैरा स्पेशल फोर्सेज’ (1 पैरा एसएफ) के एक जांबाज अफसर कैप्टन मोहित शर्मा थे.
कैप्टन मोहित शर्मा ने आतंकी नेटवर्क को किया नस्तेनाबूद
कई दिनों तक आतंकियों के बीच अंडरकवर में रहने के बाद, 16 मार्च 2004 को जब आतंकियों ने अपनी चौकसी कम की, तो ‘इफ्तिखार भट्ट’ ने अपना असली रूप दिखाया. पलक झपकते ही कैप्टन मोहित ने हिजबुल के टॉप कमांडर अबू तोरारा और सबजारा को मौत के घाट उतार दिया और पूरे आतंकी नेटवर्क की कमर तोड़ दी. इस अदम्य साहस के लिए उन्हें ‘सेना मेडल’ (वीरता) से नवाजा गया.
हरियाणा से सेना में शामिल होने तक का सफर
13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक में जन्मे मोहित शर्मा को घर में सब प्यार से ‘चिंटू’ बुलाते थे. उनके पिता राजेंद्र प्रसाद शर्मा बैंक में काम करते थे और मां सुशीला शर्मा एक गृहिणी थीं. उनका परिवार बाद में गाजियाबाद (यूपी) के साहिबाबाद इलाके में बस गया. मोहित की पढ़ाई दिल्ली के मानव स्थली स्कूल, साहिबाबाद के होली एंजल्स और फिर डीपीएस गाजियाबाद से हुई.
12वीं के बाद मोहित ने महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन ले लिया. लेकिन, उनके दिल में तो सेना की वर्दी बसती थी. इसी दौरान उन्होंने एनडीए (राष्ट्रीय रक्षा अकादमी) का कठिन इंटरव्यू पास कर लिया और इंजीनियरिंग छोड़कर 1995 में सेना में शामिल होने पुणे चले गए.
दोस्तों से मिला ‘माइक’ नाम
यहां मोहित को ‘इंडिया स्क्वाड्रन’ में रखा गया और दोस्तों ने उन्हें ‘माइक’ नाम दिया. मोहित ने यहां खुद को हर मोर्चे पर साबित किया. वह एक चैंपियन घुड़सवार बने. इतना ही नहीं, उन्होंने बॉक्सिंग में फेदरवेट चैंपियनशिप जीती और एकेडमी के बेस्ट तैराकों में अपना नाम दर्ज कराया.
IMA के साथ शुरू किया सफर
1998 में मोहित शर्मा देहरादून की इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएएमए) पहुंचे. उनकी नेतृत्व क्षमता इतनी शानदार थी कि उन्हें ‘बटालियन कैडेट एडजुटेंट’ (बीसीए) का प्रतिष्ठित पद मिला. उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से मिलने का दुर्लभ सम्मान भी प्राप्त हुआ. 11 दिसंबर 1999 को वह सेना की ‘5 मद्रास’ रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट बनकर शामिल हुए.
शुरुआती पोस्टिंग के बाद मोहित को कश्मीर में ’38 राष्ट्रीय राइफल्स’ में भेजा गया. यहां उन्होंने आतंकियों से सीधे लोहा लेना सीखा. उनके शानदार काम के लिए 2002 में उन्हें ‘थल सेनाध्यक्ष प्रशंसा पदक’ मिला.
कश्मीर में कमांडोज के इंस्ट्रक्टर बने
मोहित शर्मा को कुछ और भी बड़ा करना था. दिसंबर 2002 में उन्होंने सेना की ‘पैरा स्पेशल फोर्सेज’ में जाने का फैसला किया. 2003 में ‘मैरून बेरेट’ पहनकर 1 पैरा (एसएफ) के कमांडो बन गए. उनके अनुभव को देखते हुए सेना ने उन्हें 2005 से 2006 तक बेलगाम में नए कमांडोज को ट्रेनिंग देने के लिए ‘इंस्ट्रक्टर’ भी बनाया.
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ऑपरेशन पिनाका ने ली जान
मार्च 2009 में कश्मीर के कुपवाड़ा का हाफरुदा जंगल आतंकियों की घुसपैठ का अड्डा बना हुआ था. 21 मार्च 2009 को खुफिया जानकारी मिली कि कुछ आतंकी घने जंगल में छिपे हैं. मेजर मोहित शर्मा अपनी ‘ब्रावो असॉल्ट टीम’ के साथ ‘ऑपरेशन पिनाका’ के तहत जंगल में घुस गए.
अचानक तीन तरफ से आतंकियों ने उनकी टीम पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी. यह एक खतरनाक घात था. इस अचानक हुए हमले में मोहित के चार कमांडो साथी बुरी तरह घायल होकर ‘किल जोन’ में फंस गए.
टीम के लिए खुद को किया शहीद
अपनी जान की परवाह किए बिना मेजर मोहित शर्मा ने दो घायल साथियों को सुरक्षित निकाला और अपनी गन से आतंकियों पर कहर बनकर टूट पड़े. इस भीषण गोलाबारी में उन्हें कई गोलियां लगीं. लहूलुहान होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी आखिरी सांस तक आतंकियों से लड़ते रहे, ताकि उनकी टीम सुरक्षित रह सके.
‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया
उन्होंने इस एनकाउंटर में अपनी जान की आहुति दे दी, लेकिन आतंकियों के मंसूबों को खाक में मिला दिया. अदम्य साहस, निस्वार्थ भाव और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने के लिए मेजर मोहित शर्मा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया.
-भारत एक्सप्रेस
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