मनोज जोशी आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. उन्होंने पर्दे पर चाणक्य जैसी गंभीर भूमिकाएं भी निभाईं और कचरा सेठ बनकर लोगों को लोटपोट भी किया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह यादगार किरदार आखिर पैदा कैसे हुआ?
ये साल 2006 का है, जब फिल्म ‘फिर हेरा फेरी’ की तैयारी चल रही थी. उस वक्त मनोज जोशी एक थिएटर प्ले (नाटक) कर रहे थे. फिल्म के निर्देशक नीरज वोरा, जो मनोज के अच्छे दोस्त भी थे, उनका वो नाटक देखने पहुंचे. मंच पर मनोज जोशी की लंबी कद-काठी और उनके बोलने के कॉमिक अंदाज ने नीरज का दिल जीत लिया. उन्हें लगा कि यही वो शख्स है जो कचरा सेठ के रोल में जान फूंक सकता है.
हालांकि, रंगमंच वाले उस किरदार को सीधे फिल्म में नहीं उतारा गया. नीरज वोरा ने उनके लुक पर काफी मेहनत की. मनोज के असली दांतों की जगह नकली टेढ़े दांत लगाए गए, मोटा चश्मा पहनाया गया और सादे कुर्ता-पजामा वाला गेटअप दिया गया. लेकिन मनोज ने अपने बोलने का वो खास लहजा वही रखा जो उनके नाटक में था. नतीजा यह हुआ कि 18 साल बाद भी आज ‘कचरा सेठ’ मीम्स की दुनिया का बेताज बादशाह बना हुआ है.
मनोज जोशी रातों-रात स्टार नहीं बने. उनके अभिनय की जड़ें मराठी, गुजराती और हिंदी थिएटर में बहुत गहरी हैं. उन्होंने टीवी के मशहूर सीरियल ‘एक महल हो सपनों का’ में एक गंभीर मुखिया की भूमिका निभाई थी, जिसे घर-घर में पसंद किया गया.
मनोज जोशी का अभिनय सफर
मनोज ने इतिहास के सबसे कठिन किरदारों में से एक ‘चाणक्य’ को भी जिया है. साल 2015 के ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ में उनकी विद्वत्ता और गंभीर अभिनय ने दर्शकों को प्रभावित किया. एक तरफ हंसाने वाला कचरा सेठ और दूसरी तरफ राजनीति के चाणक्य यह विरोधाभास ही उनकी कला की असली ताकत है.
अगर आप 2000 के दशक की कॉमेडी फिल्मों के शौकीन हैं, तो ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘धूम’, ‘भागम भाग’, ‘चुप चुप के’ और ‘भूल भुलैया’ जैसी फिल्मे है. प्रियदर्शन की फिल्मों में तो वह एक अनिवार्य हिस्सा बन गए थे.
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-भारत एक्सप्रेस
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