Gangotri Glacier: आईआईटी इंदौर के एक ताज़ा अध्ययन से खुलासा हुआ है कि पिछले चार दशकों में गंगोत्री ग्लेशियर ने अपने कुल जल प्रवाह का करीब 10% हिस्सा खो दिया है, जो पहले बर्फ पिघलने (स्नोमेल्ट) से मिलता था. अब इस प्रवाह में वर्षा और भूजल का योगदान बढ़ रहा है. इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और तापमान में वृद्धि को माना जा रहा है.
यह शोध आईआईटी इंदौर की ग्लेशी-हाइड्रो-क्लाइमेट लैब की डॉक्टोरल स्कॉलर पारुल विंजे के नेतृत्व में किया गया है. अध्ययन को Journal of the Indian Society of Remote Sensing में प्रकाशित किया गया है. इसमें अमेरिका के चार विश्वविद्यालयों और नेपाल स्थित ICIMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) के वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया है.
बर्फ की जगह बारिश का बढ़ता प्रभाव
शोध में 1980 से 2020 तक के उपग्रह और जमीनी आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पाया गया कि पहले जहां गंगोत्री का जल प्रवाह 70% तक बर्फ पिघलने से आता था, वह अब घटकर लगभग 60% रह गया है. 2000-2010 के दौरान यह भाग 52% तक गिर गया था, जो 2010-2020 में बढ़कर 63% हो गया. इस उतार-चढ़ाव के पीछे सर्दियों का बदलता मौसम है.
तापमान और वर्षा में बदलाव
अध्ययन में बताया गया है कि 2001-2020 की तुलना में 1980-2000 के मुकाबले औसत तापमान में 0.5°C की वृद्धि हुई है. सर्दियों के तापमान में 2°C की गिरावट और 262 मिमी ज्यादा वर्षा हुई है. इससे सर्दियों में अधिक बर्फ बनी, जो गर्मियों में तेजी से पिघली और गंगा का बहाव बढ़ा गया. इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा का पीक डिस्चार्ज (अधिकतम प्रवाह) अब अगस्त से खिसककर जुलाई में आ गया है.
खतरे की चेतावनी
पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष व नदी विशेषज्ञ डॉ. कल्याण रुद्र के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियर हर साल औसतन 46 सेंटीमीटर तक पतले हो रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘मैंने तीन दशकों तक गंगोत्री का अध्ययन किया है और देखा है कि उसका स्नाउट (मुख्य छोर) लगातार पीछे हट रहा है.’
आईआईटी खड़गपुर के भूजल वैज्ञानिक डॉ. अभिजीत मुखर्जी ने बताया कि लद्दाख समेत अन्य हिमालयी क्षेत्रों में भी यही स्थिति बन रही है. इससे कृषि, जलविद्युत और जल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है.
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