हिंदी साहित्य जगत के लिए आज (मंगलवार) का दिन एक अपूरणीय क्षति लेकर आया है. प्रख्यात लेखक, कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार को रायपुर के एम्स (AIIMS) अस्पताल में निधन हो गया. वे 88 वर्ष के थे. एम्स के पीआरओ लक्ष्मीकांत चौधरी ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि शाम 4:58 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनकी मृत्यु का मुख्य कारण शरीर के कई अंगों में संक्रमण (Multi-organ infection) होना बताया गया है.
सांस लेने में तकलीफ के बाद हुए थे भर्ती
विनोद कुमार शुक्ल के पुत्र शाश्वत शुक्ल ने बताया कि उनके पिता को सांस लेने में समस्या होने के कारण 2 दिसंबर को रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था. इससे पहले अक्टूबर में भी उनकी तबीयत बिगड़ी थी, तब उन्हें एक निजी अस्पताल में ले जाया गया था. वहां से ठीक होकर वे घर लौट आए थे, लेकिन दिसंबर की शुरुआत में उनकी हालत फिर से नाजुक हो गई. अस्पताल में डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. उनके परिवार में पत्नी, एक बेटा और एक बेटी हैं.
इसी साल मिला था सर्वोच्च ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’
विनोद कुमार शुक्ल का जाना इसलिए भी भावुक कर देने वाला है क्योंकि इसी वर्ष की शुरुआत में उन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ’59वें ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से नवाजा गया था. वे छत्तीसगढ़ से यह सम्मान पाने वाले पहले साहित्यकार बने. उनकी रचनाएं अपनी सरलता और जादुई शैली के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध रहीं. उन्होंने आम आदमी के जीवन को इतने सरल शब्दों में उकेरा कि पाठक उनसे सीधे जुड़ जाते थे.
प्रधानमंत्री मोदी ने अर्पित की श्रद्धांजलि
पीएम नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि विनोद कुमार शुक्ल जी का निधन अत्यंत दुखद है. हिंदी साहित्य में उनके अमूल्य योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा. प्रधानमंत्री ने उनके परिजनों और प्रशंसकों के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट कीं.
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिन्दी साहित्य जगत में अपने अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।
— Narendra Modi (@narendramodi) December 23, 2025
विनोद कुमार शुक्ल की साहित्यिक यात्रा 1971 में उनकी पहली कविता पुस्तक ‘लगभग जय हिंद’ से शुरू हुई थी. उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई. अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वे थोड़े भावुक भी थे. उन्होंने एक बार कहा था कि उनके पास लिखने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है, लेकिन समय तेजी से हाथ से निकल रहा है. आज उनके निधन से हिंदी साहित्य का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया.
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