Jaswant Singh Khalra
Jaswant Singh Khalra: पंजाब जब सुलग रहा था तो उसने बंदूक नहीं कलम और कैमरे को अपना हथियार बनाया. गुरुओं की धरती पर जब कानून के रक्षक खून बहा रहे थे तब वो गुमनाम मौतों को नाम देने का काम कर रहा था. जब पंजाब की जवानी को बूट के तले रौंदा जा रहा था तो उसने बेबस परिवारों को न्याय दिलाया. अंत में पंजाब के इतिहास का सबसे जिंदादिल इंसान को बूटों तले रौंद दिया गया. उसके सीने पर दो गोलियां मारकर उसे हमेशा के लिए शांत कर दिया गया, लेकिन वह आज भी पंजाब के घर-घर में पहचाना जाता है. हम बात कर रहे हैं जसवंत सिंह खालड़ा की.
दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ Z5 पर रिलीज हो गई है. लोग इस फिल्म को खूब सराह रहे हैं. दोसांझ इस फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा के रोल में हैं. उनके इस कैरेक्टर को लेकर लोगों में जबरदस्त क्रेज देखने को मिल रहा है. सोशल मीडिया में भी यह ट्रेंड कर रहा है. आखिर जसवंत सिंह खालड़ा कौन थे और क्यों इन्हें पंजाब में “लावारिस लाशों दा वारिश” कहा जाता है. आइये बताते हैं.
जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिनका नाम 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में कथित फर्जी मुठभेड़ों, गुमशुदगियों और लावारिस बताकर किए गए शवों के अंतिम संस्कारों को सामने लाने के लिए जाना जाता है. उनका जन्म 1952 में पंजाब के खालड़ा गांव में हुआ था, जो आज तरनतारन क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है. वे 1980 के दशक में अमृतसर में बैंक से जुड़े अधिकारी के रूप में काम करते थे. बाद में वे शिरोमणि अकाली दल के ह्यूमन राइट्स विंग से जुड़े और उसके जनरल सेक्रेटरी रहे.
वो शख्स जिसने लावारिस लाशों को दिलाई पहचान
1980 और 1990 का दशक पंजाब के इतिहास का बेहद मुश्किल दौर था. एक तरफ उग्रवाद और आतंकवादी हिंसा थी, तो दूसरी तरफ पुलिस और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई. इसी दौर में पंजाब के कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उनके बेटों, भाइयों या रिश्तेदारों को पुलिस उठाकर ले गई और फिर वे कभी वापस नहीं लौटे.
A Rare Video of Sardar Jaswant Singh Khalra ji while they were investigating or gathering data of unidentified bodies in amritsar .#Satluj #sikh #Canada #Khalra pic.twitter.com/rGGaBt2rjT
— Bhullar (@bhullar998) July 5, 2026
किसी के घर का जवान बेटा गायब था, किसी का भाई, किसी का पति. परिवार थानों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन जवाब अक्सर यही मिलता था कि हमें कुछ नहीं पता. इसी दर्द, डर और बेबसी को जसवंत सिंह खालड़ा ने दस्तावेजों में दर्ज करना शुरू किया.
खालड़ा सिर्फ लोगों की बातें नहीं सुनते थे, बल्कि उन्हें लिखते थे, रिकॉर्ड जुटाते थे और सबूतों के साथ सामने रखते थे. वे परिजनों के बयान दर्ज करते, शवदाह गृहों के रिकॉर्ड खंगालते और सरकारी कागजों के आधार पर उन मामलों को सामने लाते जिन पर लंबे समय तक खामोशी बनी रही.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी यह बात दर्ज है कि जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर और तरनतारन में अपहरण, अज्ञात शवों के दाह-संस्कार और कथित गैर-कानूनी हत्याओं से जुड़े मामलों पर काम कर रहे थे.
लावारिस लाशों का सच सामने लाने वाले खालड़ा
जसवंत सिंह खालड़ा का सबसे बड़ा काम उन शवों का रिकॉर्ड खोजना था, जिन्हें पुलिस ने अज्ञात या लावारिस बताकर जला दिया था. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, खालड़ा और उनके सहयोगी जसपाल सिंह ढिल्लों ने 1995 में ऐसे आधिकारिक रिकॉर्ड सामने रखे, जिनसे अमृतसर जिले में बड़े पैमाने पर गुप्त दाह-संस्कारों का मामला उजागर हुआ.
इन रिकॉर्ड्स ने पंजाब ही नहीं, पूरे देश में सवाल खड़े कर दिए. इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर Committee for Information and Initiative on Punjab ने सुप्रीम कोर्ट से व्यापक जांच की मांग की.
बाद में CBI जांच और कानूनी कार्यवाही में 2,097 शवों का मुद्दा सामने आया. ये शव अमृतसर, मजीठा और तरनतारन क्षेत्र में अज्ञात बताकर जलाए गए थे. बाद में NHRC ने 1,513 पहचाने गए मृतकों के परिजनों के लिए करीब 27.94 करोड़ रुपये की राहत राशि की सिफारिश की.
हालांकि, खालड़ा और कई मानवाधिकार संगठनों का दावा था कि असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है. अदालत और NHRC की कार्यवाही सीमित दायरे में हुई, लेकिन खालड़ा ने जो मुद्दा उठाया, उसने पंजाब के हजारों परिवारों को आवाज दी.
“लावारिस लाशों दा वारिस” क्यों कहा गया?
पंजाबी समाज में जसवंत सिंह खालड़ा को अक्सर “लावारिस लाशों दा वारिस” कहा जाता है. इसका मतलब है-उन लाशों का वारिस, जिनकी पहचान दबा दी गई या जिन्हें कोई अपना बताने वाला बचा ही नहीं था.
वे कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए युवाओं के मामलों को उठाते थे. सिर्फ इतना ही नहीं, वे ऐसे शवों को पहचान दिलाने और उनके सम्मानजनक अंतिम संस्कार की बात भी करते थे. यही वजह है कि वे लोगों के बीच एक मानवाधिकार कार्यकर्ता से बढ़कर न्याय की आवाज बन गए.
खालड़ा का काम सिर्फ आंकड़े जुटाना नहीं था
जसवंत सिंह खालड़ा का काम सिर्फ नाम और नंबर इकट्ठा करना नहीं था. वे तीन स्तर पर काम कर रहे थे. वे गुमशुदा लोगों और कथित फर्जी मुठभेड़ों का रिकॉर्ड तैयार करते थे. उसके बाद वे शवदाह गृहों और सरकारी दस्तावेजों से सबूत जुटाते थे. और फिर वे इन मामलों को प्रेस, जनसभाओं और अदालतों तक पहुंचाते थे.
Amnesty International के अनुसार, वे उन लोगों के मामलों को सामने लाने वाले अभियान से जुड़े थे, जिन्हें पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद “गायब” बताया गया. इसी काम के दौरान वकीलों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का एक नेटवर्क भी तैयार हुआ.
पुलिस से टकराव और धमकियां
खालड़ा का काम पुलिस और प्रशासन के कुछ अधिकारियों को पसंद नहीं था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी यह बात सामने आई कि खालड़ा अमृतसर और तरनतारन में निर्दोष लोगों को आतंकवादी बताकर मारने और बिना पहचान के शव जलाने के आरोपों को उठा रहे थे.
अदालत ने माना कि पुलिस अधिकारियों को खालड़ा की गतिविधियां पसंद नहीं थीं. उन्हें धमकियां मिल रही थीं. इसके बावजूद वे पीछे नहीं हटे. वे लगातार परिवारों की आवाज बनकर पुलिस और सरकार पर सवाल उठाते रहे.
जब खालड़ा को उठा लिया गया
6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर के कबीर पार्क स्थित अपने घर पर मौजूद थे. दोपहर करीब 1 बजे पुलिस की वर्दी में कुछ लोग सफेद रंग की मारुति वैन में आए और उन्हें अपने साथ ले गए.
उस समय घर में राजीव सिंह नाम का एक व्यक्ति मौजूद था. खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर उस वक्त विश्वविद्यालय में थीं, जहां वे काम करती थीं. राजीव सिंह ने उन्हें फोन पर घटना की जानकारी दी. इसके बाद परमजीत कौर तुरंत घर पहुंचीं और अपने पति की तलाश शुरू की.
जब कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली, तो उन्होंने उसी शाम करीब 4 बजे कबीर पार्क में सहायक पुलिस अधिकारी बलदेव सिंह को शिकायत दी. पुलिस ने जांच के बाद 7 सितंबर को केस दर्ज किया.
Amnesty International के अनुसार, कई गवाहों ने खालड़ा को पंजाब पुलिस द्वारा उठाए जाते देखा था, लेकिन पुलिस ने गिरफ्तारी या हिरासत की बात से इनकार कर दिया.
इसके बाद 12 सितंबर 1995 को परमजीत कौर खालड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की. नवंबर 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंप दी.
CBI जांच और अहम गवाही
जब CBI ने जांच शुरू की, तो शुरुआत में कोई ठोस सुराग नहीं मिला. खालड़ा के बारे में जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा भी की गई.
इसके बाद एक गवाह सामने आया, जिसने इस केस को नया मोड़ दे दिया. अदालत में दी गई गवाही के मुताबिक, जसवंत सिंह खालड़ा को झबल पुलिस स्टेशन में रखा गया था. वहां उन्हें एक कमरे में बंद रखा गया. उनकी हालत कमजोर हो गई थी और शरीर पर चोटों के निशान थे.
गवाह के मुताबिक, पुलिस के कुछ वरिष्ठ अधिकारी वहां आए और खालड़ा से अपनी गतिविधियां बंद करने को कहा. उनके साथ मारपीट भी की गई. बाद में उन्हें एसएसपी अजीत सिंह संधू के आवास पर भी ले जाया गया, जहां कुछ उच्च पुलिस अधिकारियों ने उनसे बंद कमरे में बात की.
गवाही के अनुसार, एक दिन शाम के समय कुछ पुलिस अधिकारी कमरे में गए, जहां खालड़ा को रखा गया था. वहां उनके साथ मारपीट शुरू हुई. गवाह को गर्म पानी लाने के लिए कहा गया. जब वह बाहर गया, तो उसने दो बार गोली चलने जैसी आवाज सुनी.
गवाह के बयान के मुताबिक, खालड़ा की मौत हो चुकी थी. उनका शव गाड़ी की डिक्की में रखा गया और बाद में हरिके गांव के पास नहर में फेंक दिया गया. उसने यह भी कहा कि वह लंबे समय तक डर के कारण यह बात किसी को नहीं बता सका, क्योंकि उसे अपनी जान का खतरा था.
लंबी कानूनी लड़ाई और सजा
जसवंत सिंह खालड़ा का मामला कई सालों तक अदालतों में चला. साल 2005 में छह पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया. साल 2007 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पांच अधिकारियों की दोषसिद्धि बरकरार रखी और उनकी सजा को उम्रकैद में बदल दिया. एक अधिकारी को बरी कर दिया गया.
नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि खालड़ा का अपहरण हुआ था. अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों पर यह जिम्मेदारी थी कि वे बताएं कि खालड़ा के साथ बाद में क्या हुआ.
खालड़ा की विरासत
जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी सिर्फ एक मानवाधिकार कार्यकर्ता की हत्या की कहानी नहीं है. यह उन हजारों परिवारों की कहानी है, जिनके अपने लोग अचानक गायब हो गए और जिन्हें सालों तक सच का इंतजार करना पड़ा.
खालड़ा ने उन परिवारों को आवाज दी, जिनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही थी. उन्होंने उन शवों को पहचान दिलाने की कोशिश की, जिन्हें लावारिस बताकर जला दिया गया था. उनके काम की वजह से पंजाब के “मास क्रीमेशन केस” को अदालत और NHRC तक पहुंच मिली.
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आज भी जसवंत सिंह खालड़ा का नाम मानवाधिकारों की लड़ाई में सम्मान के साथ लिया जाता है. 2025 में अमेरिका के कैलिफोर्निया के Fresno में एक सार्वजनिक स्कूल का नाम उनके नाम पर रखने का फैसला भी इस बात का उदाहरण है कि उनकी लड़ाई को दुनिया भर में याद किया जाता है.
-भारत एक्सप्रेस
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