पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को कैसे सिखाई जाती है 'आजादी' की अलग परिभाषा
14 और 15 अगस्त की तारीखें आते ही भारतीय उपमहाद्वीप में 1947 का वह ऐतिहासिक दौर तरोताजा हो जाता है, जिसने दुनिया के नक्शे पर दो स्वतंत्र राष्ट्रों को जन्म दिया. भारत में यह दिन लगभग दो सदियों की ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ चले लंबे, अहिंसक और देशव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन की विजय गाथा के रूप में याद किया जाता है.
भारतीय इतिहास की किताबों में महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलनों से लेकर शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ संकल्प की गाथाओं को अनेक धाराओं और असंख्य बलिदानों के रूप में पढ़ाया जाता है.
लेकिन, ठीक सीमा पार यानी पाकिस्तान में इसी 1947 के दौर को देखने और पढ़ाने का नजरिया बिल्कुल अलग है.
वहां के शैक्षणिक और ऐतिहासिक ढांचे में 1947 की कहानी का केंद्र ब्रिटिश शासन से भारत की सामूहिक मुक्ति नहीं, बल्कि ‘एक अलग मुस्लिम राष्ट्र’ के निर्माण की यात्रा है.
पाकिस्तान में क्या है ‘आजादी’ की परिभाषा?
पाकिस्तानी इतिहास की आधिकारिक और प्रामाणिक पाठ्यपुस्तकों में 1947 को एक औपनिवेशिक सत्ता के अंत से ज्यादा ‘एक नए इस्लामी राष्ट्र के जन्म’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
वहां के पाठ्यक्रम में:
- मुस्लिम समुदाय की अलग सियासी पहचान
- ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की राजनीति
- 23 मार्च 1940 का ‘लाहौर प्रस्ताव’ (लाहौर रेजोल्यूशन)
- और ‘टू-नेशन थ्योरी’ (द्वि-राष्ट्र सिद्धांत) को स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य आधार माना जाता है.
इस पूरी ऐतिहासिक कथा का एकमात्र केंद्रीय पात्र मोहम्मद अली जिन्ना को बनाया गया है, जिन्हें वहां ‘कायदे-आजम’ (महान नेता) के रूप में पूजा जाता है. भारत में जहां स्वतंत्रता संग्राम को एक समावेशी और व्यापक भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के तौर पर देखा जाता है, वहीं पाकिस्तान के पाठ्यक्रम में मुख्य जोर ‘मुस्लिम राजनीतिक चेतना’ और ‘पृथक राष्ट्र की मांग’ पर ही सीमित रहता है.
गांधी, नेहरू और भगत सिंह की जगह जिन्ना ही क्यों?
1947 से पहले भारत और पाकिस्तान एक ही औपनिवेशिक राजनीतिक और सांस्कृतिक इकाई का हिस्सा थे. ऐसे में स्वाभाविक रूप से दोनों देशों के इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम के नायक भी साझा होने चाहिए थे. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और ‘सीमांत गांधी’ खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियां अविभाजित भारत के साझा इतिहास का हिस्सा थीं.
लेकिन 1947 में विभाजन के बाद जब पाकिस्तान ने अपनी ‘राष्ट्रीय पहचान’ गढ़ी, तो वहां के पाठ्यक्रम निर्माताओं ने उन सभी अध्यायों को हाशिए पर धकेल दिया जो साझा विरासत की बात करते थे.
इसके बजाय उन घटनाओं और चरित्रों को इतिहास का नायक बनाया गया, जो केवल ‘पाकिस्तान आंदोलन’ की राजनीतिक यात्रा को सही ठहराते थे. यही कारण है कि वहां के बच्चों को भारत के राष्ट्रीय आंदोलन की तुलना में ‘मुस्लिम लीग की राजनीति’ का पाठ ज्यादा विस्तार से पढ़ाया जाता है.
जमीनी हकीकत: पाकिस्तान में पढ़ चुके लोगों ने क्या बताया?
पाकिस्तान में अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद भारत की नागरिकता लेने वाले लोगों के अनुभव भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि सीमा पार इतिहास का पाठ पूरी तरह बदल जाता है.
पाकिस्तान से भारत आए सोभराज भील बताते हैं कि वहां इतिहास (History) और सामाजिक अध्ययन (Social Studies) की किताबों में जिन्ना और पाकिस्तान के निर्माण को ही एकमात्र केंद्रीय विषय बनाकर प्रस्तुत किया जाता था. पाठ्यक्रम में मुख्य जोर इस बात पर रहता था कि ‘मुसलमानों को अलग देश की जरूरत क्यों पड़ी’ और ‘पाकिस्तान किन विषम परिस्थितियों में बना’. उनका कहना है कि शुरुआती दौर में सिंधु घाटी सभ्यता और भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास के कुछ अंश शामिल थे, लेकिन बाद के दशकों में पाठ्यक्रम का पूरी तरह से इस्लामीकरण कर दिया गया.
इसी तरह पाकिस्तान में पढ़ाई कर चुके जान बहादुर सिंह बताते हैं कि वहां बच्चों को 1947 की कहानी एक अलग दृष्टिकोण से समझाई जाती है. उनके मुताबिक, “महात्मा गांधी या भगत सिंह जैसे महापुरुषों का जिक्र या तो सिरे से गायब रहता है, या फिर उन्हें केवल ‘हिंदू नेताओं’ के रूप में एकपक्षीय संदर्भ में दिखाया जाता है, जबकि जिन्ना को सर्वगुण संपन्न उद्धारक के रूप में पेश किया जाता है.”
क्या पाकिस्तानी किताबों से गांधी का नाम पूरी तरह गायब है?
यह कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा कि पाकिस्तान की सभी किताबों में महात्मा गांधी या अन्य भारतीय नेताओं का नाम बिल्कुल नहीं है. समय, कक्षा और अलग-अलग प्रांतीय बोर्ड्स (जैसे पंजाब, सिंध या केपीके बोर्ड) के हिसाब से पाठ्य सामग्री में थोड़ा-बहुत अंतर जरूर रहा है.
हालांकि, असली अंतर प्रस्तुति और दृष्टिकोण का है:
भारत में: महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य वास्तुकार और राष्ट्रपिता के रूप में पढ़ाए जाते हैं.
पाकिस्तान में: गांधी को मुख्यतः कांग्रेस के एक ‘हिंदू नेता’ और विभाजन के समय जिन्ना की मांगों का विरोध करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
पुस्तकों में मजहबी पूर्वाग्रह और नफरत का मुद्दा
पाकिस्तान के शैक्षणिक पाठ्यक्रम पर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं. बीबीसी (BBC) और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि पाकिस्तान की कई सरकारी पाठ्यपुस्तकों में अल्पसंख्यकों (विशेषकर हिंदुओं और सिखों) के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण और नकारात्मक सामग्री शामिल रही है.
शिक्षाविदों और इतिहासकारों का मानना है कि कुछ पुराने पाठ्यक्रमों में गैर-मुस्लिम समुदायों को ‘शत्रु’ या ‘विश्वासघाती’ के रूप में चित्रित करने वाले दावे शामिल किए गए थे. हालांकि, हाल के वर्षों में पाकिस्तान के भीतर भी प्रगतिशील शिक्षाविदों ने इस तरह की नफरती सामग्री को हटाने और पाठ्यक्रम में सुधार करने की मांग उठाई है.
‘धार्मिक विचारधारा’ और इतिहास का घाल-मेल
पाकिस्तान में इतिहास शिक्षण की सबसे बड़ी समीक्षा यह है कि वहां इतिहास (History) को समाजशास्त्र के बजाय ‘धार्मिक विचारधारा’ (Ideology of Pakistan) के चश्मे से पढ़ाया जाता है. आलोचकों का तर्क है कि इतिहास में धार्मिक और राजनीतिक दृष्टिकोण का अत्यधिक समावेश होने के कारण वहां के विद्यार्थियों को अपने ही उपमहाद्वीप के हजारों साल पुराने बहुसांस्कृतिक और साझा इतिहास की निष्पक्ष समझ नहीं मिल पाती.
एक ही इतिहास, दो अलग-अलग राष्ट्रीय कथाएं
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भारत और पाकिस्तान — दोनों की कहानी की शुरुआत एक ही बिंदु से होती है: ब्रिटिश हुकूमत, औपनिवेशिक शोषण, 1857 का गदर, आजादी की तड़प और सांप्रदायिक तनाव.
लेकिन 1947 के विभाजन रेखा खिंचते ही दोनों मुल्कों ने इस साझा अतीत से अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से दो अलग-अलग ‘राष्ट्रीय कथाएं’ गढ़ लीं:
भारत की राष्ट्रीय कथा: विविधता में एकता, कड़ा जन-आंदोलन, सर्वधर्म समभाव और ब्रिटिश साम्राज्य से भारत माता की मुक्ति.
पाकिस्तान की राष्ट्रीय कथा: मुस्लिम पहचान की रक्षा, टू-नेशन थ्योरी का क्रियान्वयन और जिन्ना के नेतृत्व में एक नए मुल्क की स्थापना.
इसीलिए 14 और 15 अगस्त केवल दो पड़ोसी देशों के स्वतंत्रता दिवस भर नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत हैं कि एक ही इतिहास को दो देश अपनी-अपनी किताबों में कितने अलग तरीके से दर्ज कर सकते हैं.
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