प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए आत्मिक विकास, सेवा भावना और राष्ट्र निर्माण के महत्व को रेखांकित किया. अपने संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि जब व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और देश के लिए कुछ करने की भावना विकसित होती है, तो यही भाव उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.
पीएम मोदी ने लिखा, “आत्मिक विकास व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना का संचार करता है. इसी से प्रेरित होकर आज हमारी युवा शक्ति देश को हर क्षेत्र में आगे ले जा रही है.”
आत्मिक विकास व्यक्ति के भीतर सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की भावना का संचार करता है। इसी से प्रेरित होकर आज हमारी युवा शक्ति देश को हर क्षेत्र में आगे ले जा रही है।
आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती।
तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते ।। pic.twitter.com/mubMNrYdQh
— Narendra Modi (@narendramodi) August 5, 2026
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत श्लोक भी साझा किया. इस श्लोक का भावार्थ है कि जीवन में स्वयं का विकास करना और लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करते रहना ही सही मार्ग है. जो लोग अपने ज्ञान, क्षमता और कौशल को बेहतर बनाते हैं, वे न सिर्फ अपनी तरक्की करते हैं बल्कि समाज के लिए भी सकारात्मक योगदान देते हैं.
लगातार प्रयास और ज्ञान की शक्ति पर भी दिया संदेश
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक के जरिए कोई संदेश साझा किया हो. इससे पहले मंगलवार को भी उन्होंने एक श्लोक साझा करते हुए युवाओं को निरंतर मेहनत और आत्मविकास का महत्व समझाया था.
प्रधानमंत्री ने कहा था कि लगातार प्रयास और साधना से व्यक्ति की प्रतिभा और अधिक निखरती है. आज देश के युवा इसी सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अपनी मेहनत से दुनिया भर में भारत का नाम रोशन कर रहे हैं.
मंगलवार को साझा किए गए श्लोक का अर्थ बताते हुए कहा गया था कि इस संसार में ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र चीज नहीं है. जब व्यक्ति कर्म, अनुशासन और साधना के रास्ते पर चलता है, तो समय के साथ उसे अपने भीतर ही ज्ञान और आत्मबोध की अनुभूति होने लगती है.
मुश्किल समय में धैर्य बनाए रखने का संदेश
इससे एक दिन पहले सोमवार को भी प्रधानमंत्री ने संस्कृत श्लोक के माध्यम से धैर्य और कर्म के महत्व पर प्रकाश डाला था. उन्होंने संदेश दिया था कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, इंसान को अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए.
इस श्लोक का भाव यह है कि खराब समय हमेशा स्थायी नहीं रहता. धैर्य रखने वाला व्यक्ति मेहनत और सही प्रयासों के जरिए दोबारा बेहतर स्थिति हासिल कर सकता है. जैसे समुद्र में जहाज टूट जाने के बाद भी एक कुशल नाविक हार नहीं मानता और बचने के लिए लगातार प्रयास करता रहता है, उसी तरह इंसान को भी कठिन परिस्थितियों में अपने कर्म और हिम्मत का साथ नहीं छोड़ना चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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