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सुप्रीम कोर्ट ने 199 एमबीबीएस-पीजी सीटें कीं बहाल, जामिया हमदर्द के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफ़ा को सौंपा सभी वित्तीय प्रभार

शीर्ष अदालत ने हमदर्द परिवार के झगड़े के बीच जामिया हमदर्द के हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च (HIMSR) में 150 एमबीबीएस व 49 एमडी सीटों के लिए ‘अनुमत्ति की सहमति’ दी, सारी फ़ीस और लेखा सेना अधिकारी को जमा करने के आदेश दिए

नई दिल्ली, 27 मई: एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च (HIMSR) में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए 199 मेडिकल छात्रों के दाख़िले का रास्ता साफ़ कर दिया है। इस आदेश ने जामिया हमदर्द और HIMSR का वित्तीय प्रशासन प्रभावी रूप से एक सेना अधिकारी की निगरानी में रख दिया है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भूयान की पीठ ने बुधवार को इस पूरे प्रकरण से संबंधित अनेक निर्देश जारी किए। 

सुप्रीम कोर्ट का संदेश: सेना अधिकारी की तटस्थ निगरानी में ही संभव है पारदर्शी प्रशासन

सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने ट्रस्टियों, प्रबंधन, छात्रों और पूरे शैक्षणिक समुदाय को एक बड़ा कानूनी संदेश दिया है। अदालत ने सभी वित्तीय मामलों का अधिकार कर्नल ताहिर मुस्तफ़ा को सौंप दिया है, जो भारतीय सेना के एक सेवारत अधिकारी हैं। इन्हें जुलाई 2025 में हमदर्द परिवार के अंदर चल रहे कटु उत्तराधिकार संघर्ष के बीच जामिया हमदर्द का रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया था।

सूत्रों के अनुसार, कर्नल इससे पहले सेंटर फ़ॉर ऑटोमेटेड मिलिट्री सर्वे (CAMS) के निदेशक और विदेश मंत्रालय में सीमा प्रकोष्ठ के प्रमुख रह चुके हैं। उन्होंने भी अदालत से एक तटस्थ निगरानी तंत्र स्थापित करने की याचिका दायर की थी।

विभिन्न क़ानूनी सूत्रों से भारत एक्सप्रेस की हुई बातचीत से यह साफ़ हुआ कि दो ट्रस्टी गुटों के बीच “लंबे समय से चली आ रही रस्साकशी” के कारण यह संस्थान वित्तीय अनियमितताओं का अखाड़ा बन गया था। सूत्र बताते हैं कि “निजी पक्ष खातों पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे थे” और विश्वविद्यालय का “चरित्र और पैटर्न शैक्षणिक मानकों को नष्ट करने वाला” हो चला था।

चिदंबरम ने उठाई सीएजी रिपोर्ट की बात, सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने, जो प्रतिवादियों की ओर से पेश थे, ने अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि संस्थान बिना किसी कार्यशील वित्त समिति या कार्यकारिणी समिति के चल रहा था, पूरी तरह से तदर्थ और अस्तथाई तरीक़े से।

मामले से जुड़े एक सूत्र ने भारत एक्सप्रेस को बताया, “श्री चिदंबरम ने कहा कि अगर कल ईडी या सीबीआई की छापेमारी होती है तो इसकी ज़िम्मेदारी रजिस्ट्रार पर आएगी।” उन्होंने वैधानिक निकायों के अभाव पर ध्यान दिलाया और एक सीएजी ऑडिट रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें 2011 से 2023 के बीच ₹813 करोड़ के चौंकाने वाले धन के दुरूपयोग का आरोप लगाया गया था।

शीर्ष अदालत ने इन तर्कों का संज्ञान लिया। पीठ ने कहा कि इस मामले के “अनोखे तथ्यों” – ख़ासकर परिवार की दो शाखाओं के बीच मध्यस्थता विवाद – को देखते हुए एक तटस्थ, उच्च-स्तरीय सरकारी अधिकारी की मौजूदगी आवश्यक थी।

‘अनुमत्ति की सहमति’ और रजिस्ट्रार को कोर्ट द्वारा दी गई शक्ति

हालांकि याचिकाकर्ताओं (असद मुईद एवं अन्य) ने विश्वविद्यालय को औपचारिक ‘सहमति पत्र’ जारी करने के निर्देश देने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इन प्रार्थनाओं से आगे बढ़कर कर्नल ताहिर मुस्तफ़ा को तथ्यात्मक वित्तीय नियंत्रक (डी फ़ैक्टो फ़ाइनेंशियल कंट्रोलर) नियुक्त कर दिया।

अदालत ने आदेश में कहा, “अपने पिछले दिनांक 11.02.2026 के आदेश के अनुपालन में हम यह अवलोकन करते हैं कि इस विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) के परिणाम के अधीन रहते हुए, शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए अनुमत्ति की सहमति (कंसेंट ऑफ़ अफ़िलिएशन) प्रथम प्रतिवादी विश्वविद्यालय द्वारा तीसरे याचिकाकर्ता संस्थान के पक्ष में प्रदत्त मानी जाएगी।”

वित्तीय संकट और पारदर्शिता का रास्ता

सबसे अहम बात यह है कि सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया कि 150 एमबीबीएस और 49 स्नातकोत्तर सीटों के लिए सभी फ़ीस भुगतान रजिस्ट्रार को जमा कराए जाएं। याचिकाकर्ता कॉलेज को अलग से वित्तीय लेखा रखने और फ़ीस तथा भुगतान का ब्यौरा कर्नल मुस्तफ़ा के कार्यालय में जमा कराने का आदेश दिया गया है।

इस मामले से जुड़े एक क़ानूनी विशेषज्ञ ने पुष्टि करते हुए कहा, “अब सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्रार को प्रत्यक्ष पर्यवेक्षण में रखा है। न तो एचआईएमएसआर(HIMSR) प्रबंधन और न ही विश्वविद्यालय उन पर दबाव डाल सकता है। सारे खाते एक तटस्थ सेना अधिकारी के पास जाएंगे।”

नीट पर आधारित दाख़िला प्रक्रिया बहाल

इस अंतरिम आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) को एचआईएमएसआर(HIMSR) के लिए यूजी पोर्टल(UG Portal) तक पहुंच बहाल करने का निर्देश दिया गया है। यह आदेश विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा लगाए गए मनमाने प्रतिबंधों को समाप्त करते हुए, नीट रैंकिंग के आधार पर ही दाख़िला प्रक्रिया को मान्यता देता है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि एसएलपी(SLP) के लंबित रहने से उच्च न्यायालय को इस मामले का निपटारा करने से कोई रोक नहीं होगी, लेकिन छात्रों के तत्काल हित – जो परिवार की लड़ाई की भेंट चढ़ गए थे – के लिए सेना अधिकारी को ‘तटस्थ प्रेक्षक’ का दर्जा देना ज़रूरी था।



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