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दत्तात्रेय होसबोले का बड़ा बयान: “हिंदू संस्कृति वर्चस्ववादी नहीं,” अमेरिका से रिश्तों और मॉडर्नाइजेशन पर आरएसएस का विजन साफ

दत्तात्रेय होसबोले ने हाल ही में एक संबोधन में आरएसएस की कार्यप्रणाली और विचारधारा पर उठने वाले सवालों का जवाब दिया. उन्होंने ‘हिंदू’ को एक सभ्यतागत पहचान बताया और स्पष्ट किया कि कैसे परंपरा और आधुनिकता एक साथ चल सकते हैं.

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RSS Dattatreya Hosabale on Ind-US Partnership: अक्सर विवादों और चर्चाओं के केंद्र में रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के काम करने के तरीके और उसकी विचारधारा पर संगठन के जनरल सेक्रेटरी (सरकार्यवाह) दत्तात्रेय होसबोले ने बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखी है. उन्होंने न केवल भारत-अमेरिका संबंधों पर जोर दिया, बल्कि उन आरोपों का भी जवाब दिया जो आरएसएस को ‘कट्टरपंथी’ या ‘पिछड़ा’ बताते हैं.

होसबोले का मानना है कि भारत अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल तभी कर पाएगा जब वैश्विक मंच पर उसकी साझेदारी मजबूत होगी. अमेरिका के साथ रिश्तों पर उन्होंने साफ कहा कि अगर अमेरिका भारत के साथ एक रणनीतिक पार्टनरशिप चाहता है, तो यह ‘बड़े-छोटे’ के भाव से नहीं, बल्कि बराबरी के स्तर पर होनी चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देशों के बीच असली ताकत ‘पीपल-टू-पीपल’ यानी आम लोगों के जुड़ाव और आपसी भरोसे से आएगी.

आधुनिकता और संस्कृति: क्या दोनों साथ चल सकते हैं?

अक्सर यह कहा जाता है कि आरएसएस पुरानी परंपराओं में जकड़ा हुआ है, लेकिन होसबोले ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. उनका कहना है कि आधुनिक होना और अपनी संस्कृति से जुड़े रहना, दोनों एक साथ मुमकिन हैं. उन्होंने ‘सनातन’ का उदाहरण देते हुए कहा कि यह वो विचार है जो हमेशा नया (नित्य नूतन) रहता है और समय के साथ बढ़ता है. उनके मुताबिक, पूर्वी देशों ने यह साबित किया है कि आप अपनी जड़ों को छोड़े बिना भी मॉडर्न हो सकते हैं.

साथ ही आरएसएस पर लगने वाले ‘हिंदू वर्चस्ववादी’ होने के आरोप पर उन्होंने ऐतिहासिक तर्क दिए. होसबोले ने कहा कि हिंदू दर्शन में तो हर जीव और निर्जीव में एकता देखी जाती है. उन्होंने याद दिलाया कि इतिहास गवाह है, हिंदुओं ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया और न ही किसी को गुलाम बनाया. इसलिए, हिंदुओं को किसी बात के लिए माफी मांगने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनका स्वभाव कभी दूसरों को दबाने वाला रहा ही नहीं.

आरएसएस का असली काम

होसबोले ने इस बात पर चिंता जताई कि आज भी कई अमेरिकियों की नजर में भारत का मतलब सिर्फ ‘गरीबी, झुग्गियां और सपेरे’ है. वे भूल जाते हैं कि भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और एक ग्लोबल टेक हब है. इसी तरह आरएसएस के बारे में भी एक नकारात्मक कहानी (नैरेटिव) गढ़ी गई है कि वे महिलाओं या अल्पसंख्यकों के विरोधी हैं.

उन्होंने समझाया कि असल में संघ क्या करता है:

व्यक्तित्व निर्माण: शाखाओं के जरिए स्वयंसेवकों में अनुशासन और सेवा की भावना भरना.

सोशल कैपिटल: समाज की एकता और चरित्र निर्माण पर काम करना.

मुसीबत में साथ: बाढ़ या भूकंप जैसी आपदाओं में सबसे पहले मदद के लिए पहुंचना.

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पड़ोसी देशों और अल्पसंख्यकों के साथ संवाद

धर्म और पहचान के मुद्दे पर उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ के लिए ‘हिंदू’ एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान है, न कि केवल पूजा पद्धति. उन्होंने स्वीकार किया कि राजनीति और इतिहास की गलत व्याख्याओं के कारण समाज में तनाव पैदा होता है, लेकिन इसका समाधान सिर्फ ‘संवाद’ है. उन्होंने बताया कि संघ लगातार अल्पसंख्यक समुदायों के साथ बातचीत कर रहा है ताकि गलतफहमियां दूर हों. वहीं पड़ोसियों के साथ तनाव के मुद्दे पर उन्होंने इशारा किया कि समस्या सिर्फ उस एक पड़ोसी के साथ है जो ‘भारत की कोख’ से जन्मा, लेकिन आज भी संघर्ष की राह पर है.

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-भारत एक्सप्रेस



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